नई दिल्‍ली [जागरण स्‍पेशल]। चुनाव अंतिम दौर में है। एक चरण बाकी रह गया है। ऐसे में राजनीतिक दलों की निगाहें संभावित परिणामों की ओर टिक गई हैं। वहीं, कांग्रेस का दावा है कि वह सहयोगियों के साथ मिलकर सरकार बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है और उसका लक्ष्य मोदी सरकार को हटाने का है। पार्टी के रुख और मुद्दों पर पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता अश्वनी कुमार से ‘दैनिक जागरण’ के विशेष संवाददाता अरविंद पांडेय ने बातचीत की, अश्वनी का कहना है कि कांग्रेस अपने लक्ष्य के करीब है। चर्चा के मुख्य अंश...

छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस ने कर्जमाफी का दांव चला और उन राज्यों में सरकार बन गई। लोकसभा चुनाव में पार्टी की ‘न्याय’ योजना का कितना लाभ मिलेगा?
- ‘न्याय’ को बड़े परिदृश्य में देखने की जरूरत है। यह जहां 72 हजार रुपये सालाना की बात करती है, वहीं यह सामाजिक, आर्थिक और सियासी न्याय की भी बात करती है। जिसका आधार बराबरी है। सम्मान है। अधिकार और सामाजिक सौहार्द है। यह बात सही है कि इसका अब तक जो फोकस चुनावी अभियान में रहा है, वह लोगों को छह हजार रुपये महीने और 72 हजार रुपये सालाना दिलाना है। यह इसलिए जरूरी है क्योंकि न्यूनतम आय के आधार पर ही किसी को सामाजिक और आर्थिक न्याय मिल सकता है। कोई इंसान सम्मान का जीवन तभी व्यतीत कर सकता है जब उसकी बुनियादी जरूरतें पूरी होंगी। इसलिए काफी सोच समझ इसे प्रस्तुत किया गया है। जनता ने हाथों-हाथ लिया है। ‘न्याय’ का बड़ा परिप्रेक्ष्य है, बड़े स्तर पर सामाजिक और आर्थिक न्याय।

प्रियंका गांधी वाड्रा की एंट्री को आप कैसे देखते हैं?
- प्रियंका गांधी अगर कुछ समय पहले चुनावी मैदान में उतरतीं तो पार्टी को और ज्यादा फायदा मिलता। राहुल गांधी ने उचित समय देखकर ही उन्हें जिम्मेदारी दी है। निश्चित रूप से प्रियंका गांधी के सक्रिय राजनीति में उतरने से पार्टी को न सिर्फ उत्तर प्रदेश में बल्कि पूरे देश में लाभ मिलेगा। लोग उनमें इंदिरा गांधी की छवि देखते हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में कांग्रेस के मजबूत होने से सारे देश में पार्टी को ताकत मिलेगी।

चुनाव में भाषा की मर्यादा तार-तार होती दिख रही है। कोई चोर कह रहा है तो कोई निजी हमले कर रहा है। आप इसे कैसे देखते हैं?
- लोकतंत्र एक सभ्य समाज में, एक सभ्य वातावरण में और सभ्य राजनीतिक शैली से ही आगे बढ़ सकता है। जितनी गिरावट इस चुनाव में हमने राजनीतिक शैली में देखी है, पहले कभी नहीं देखी। राजनीतिक दल की यह जिम्मेदारी है कि वह राजनीतिक भाषा ऐसी बोले जिससे लोगों के सम्मान को ठेस न लगे। लेकिन सबसे बड़ी जिम्मेदारी इस शैली को सभ्य बनाने की प्रधानमंत्री की है। वह सर्वोच्च पद पर बैठे हैं। मेरा मानना है कि पिछले दिनों में प्रधानमंत्री ने जिस तरीके से पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को लेकर बोला है, उसका उदाहरण देश के इतिहास में नहीं मिल सकता। राजीव गांधी न केवल देश के पूर्व प्रधानमंत्री रहे हैं, बल्कि देश के एक शहीद भी हैं। वैसे भी राजनीति कुछ भी हो पर देश कुर्बानी और त्याग का सदैव आदर करता है।

राहुल गांधी लगातार प्रधानमंत्री को ‘चौकीदार चोर है’ बोलते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में इसके लिए माफी भी मांग रहे हैं। प्रधानमंत्री के लिए इस तरह के शब्दों के इस्तेमाल को किस रूप में देखते हैं।
- राहुल गांधी ने इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर स्पष्ट कर दिया है। इस बात को यहीं खत्म हो जाना चाहिए। जहां तक उनकी चुनावी रैलियों का सवाल है तो उन्होंने कभी भी चोर शब्द का इस्तेमाल नहीं किया। लोग उनके नारे पर जवाब देते थे। पर यह बात साफ है, किसी भी नेता को और किसी भी पार्टी के कार्यकर्ता को सभ्य भाषा का इस्तेमाल करना चाहिए। आप यह देखेंगे कि चुनाव से काफी पहले कांग्रेस के कुछ छोटे नेताओं ने प्रधानमंत्री को लेकर अभद्र भाषा का प्रयोग किया था तो राहुल गांधी ने उन्हें बुलाकर डांटा था और कहा था कि ऐसी भाषा का हमें इस्तेमाल नहीं करना है। वह हमेशा प्रधानमंत्रीजी या मोदीजी ही कहते हैं। कभी-कभार चुनाव की गरमी में मुंह से कुछ बातें निकल जाती हैं तो उसका भी समाधान है। मगर एक स्वर्गीय नेता को जो अपना बचाव नहीं कर सकता, को लेकर ऐसी बात करना ठीक नहीं है।

चुनाव के आखिरी दो चरणों में बोफोर्स और राजीव गांधी के मसले उठाए जाने को लेकर क्या कहना चाहेंगे?
- देखिए, बोफोर्स एक डेड (मृत) मुद्दा है। 20 साल की कानूनी प्रक्रियाओं के बाद राजीव गांधीजी निर्दोष साबित हो चुके हैं। चुनाव के समय इसे उठाना राजनीति से प्रेरित है। भाजपा घटिया राजनीति करती है। उससे निपटना हमें आता है। पूर्व प्रधानमंत्री पर निजी हमला करना प्रधानमंत्री को शोभा नहीं देता। यह उनके पद की गरिमा के अनुकूल नहीं है।

चुनाव में राष्ट्रवाद व सर्जिकल स्ट्राइक जैसे मुद्दों पर कांग्रेस की क्या सोच है?
- सर्जिकल स्ट्राइक पर पार्टी ने तब अपनी बात सामने रखी जब मोदीजी छाती पीटकर इसका श्रेय लेने लगे। तब बताना पड़ा कि सभी सरकारों ने देश की हिफाजत की है। पाकिस्तान को कई बार मुंह तोड़ जवाब दिया गया। उस समय की सरकारों ने क्या देश की हिफाजत नहीं की। लेकिन हमने कभी इस जीत को अपनी जीत नहीं बताया बल्कि देश की जीत कहा।

चुनाव बाद कांग्रेस और उसके सहयोगियों को लोकसभा में बहुमत मिला तो प्रधानमंत्री कौन होगा? क्या बसपा-सपा भी इसमें शामिल होगी?
- वैसे तो यह सारा कुछ लोकसभा के गणित पर निर्भर करता है। मगर यह दावे के साथ कह सकता हूं कि कांग्रेस और उसके सहयोगी दल मोदी सरकार को हटा सकते हैं। हमारा गठबंधन कामयाब होगा। राहुल गांधी ने भी हाल में कहा है कि उनका निशाना अर्जुन की तरह मोदी सरकार को हटाने पर है।

पिछले चुनाव में कांग्रेस को 43 सीटें मिली थीं। इस बार कितनी सीटें मिल रही हैं? कुछ आकलन कर रहे हैं?
- देखिए, मैं नंबर में नहीं जाना चाहता। जनता का जो फैसला होगा, वह मान्य होगा। पर यह दावे से कह सकता हूं कि आश्चर्यजनक परिणाम आने वाले हैं। सभी राज्यों में कांग्रेस बढ़त हासिल करने वाली है। कांग्रेस के पक्ष में आश्चर्यजनक सीटें आने वाली हैं। सहयोगियों के साथ मिलकर कांग्रेस सत्ता परिवर्तन की ओर बढ़ रही है।

सैम पित्रोदा के बयान पर उठे विवाद को लेकर क्या कहेंगे?
- सैम पित्रोदा ने अपने वक्तव्य पर सफाई दे दी है। उन्होंने कहा है कि यदि उनके बयान से कोई आहत हुआ है तो वह माफी चाहेंगे। 1984 के दंगे देश के इतिहास की शर्मनाक घटना है। उसके लिए सारा देश शर्मिंदा है। अब पिछले जख्मों पर मरहम लगाने की जरूरत है। उसे उखाड़ने की जरूरत नहीं है।

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Posted By: Sanjay Pokhriyal

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