वाराणसी [जागरण स्पेशल]। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुरुवार को मेगा रोड शो करने जा रहा हैं। एक बार फिर वो वाराणसी संसदीय सीट से ही चुनावी मैदान में है। 2014 में भी पीएम मोदी ने ऐसा ही एक रोड शो किया था। बता दें कि पीएम मोदी 26 अप्रैल को अपना नामांकन दाखिल करने वाले हैं। उनके इस रोड शो की शुरुआत बीएचयू में सिंहद्वारा पर मालवीय जी को नमन के साथ होगी। चलिए तो उन स्थानों के बारे में जानते है, जहां से पीएम का काफिला गुजरेगा। 

1- लंका: लंका क्षेत्र दरअसल,  प्राचीन काशी का महत्‍वपूर्ण स्‍थल है। प्राचीन रामलीला के दौरान इस क्षेत्र में लंका का निर्माण किया जाता था। इस वजह से रामलीला का यह प्रमुख स्‍थल लंका के नाम से ही पहचाना जाने लगा। आज भी इस क्षेत्र की यही पहचान बनी हुई है। यहीं पर महामना मदन मोहन मालवीय ने सर्वविद्या की राजधानी की कल्‍पना को मूर्तरुप दिया और काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना की थी। 2014 में भी पीएम ने लंका पर महामना मदन मोहन मालवीय की प्रतिमा पर माल्‍यार्पण कर रोड शो की शुरुआत की थी। एक बार फ‍िर से 25 अप्रैल को पीएम नरेंद्र मोदी काशी में अपने दूसरे कार्यकाल के लिए चुनावी मुहिम शुरु कर रहे हैं। 

 

2- अस्‍सी: काशी में असि घाट या अस्सी घाट महत्वपूर्ण प्राचीन घाटों में से एक माना जाता है। गंगा की धारा संग यह वाराणसी का पहला घाट माना जाता है। काशी की दक्षिणी सीमा पर गंगा और असि नदी के संगम को अस्‍सी घाट की मान्‍यता मिली थी। इस घाट का क्षेत्र भदैनीघाट तक विस्‍तृत था, मान्‍यता यह भी है कि गोस्‍वामी तुलसीदास जी ने इसी घाट पर एक गुफा में निवास कर राममचरित मानस के एक खंड की रचना करने के बाद 1680 में इसी घाट पर प्राण त्याग दिए थे।

19वीं शताब्दी के बाद यह घाट पांच अलग-अलग घाटों जिसमें भदैनी, अस्सी, गंगामहल, रीवां और तुलसी घाटों में विभाजित हो गया। वर्ष 1902 में बिहार की महारानी दुलहिन राधा दुलारी कुंवर ने काशी नरेश प्रभुनारायण सिंह से घाट तथा यहां पर मंदिर निर्माण के लिए जमीन लिया था। 1927  में महारानी की मृत्यु के कारण घाट का निर्माण पूरा नहीं हो पाया था। उनके द्वारा निर्मित लक्ष्मीनारायण पंचरत्न मंदिर आज भी स्‍थापित है। यह घाट सामाजिक -सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्व की वजह से सैलानियों के आकर्षण का केंद्र बना रहता है। घाट पर सुबह-ए-बनारस का सांस्‍कृतिक मंच अपने आप में ही बडे मंच के तौर पर आज अपनी पहचान रखता है। 

घाट पर ही असि संगमेश्वर मंदिर का काशीखण्ड में वर्णन मिलता है। यह मंदिर पुरी जगन्नाथ मंदिर के प्रतीक का स्‍वरुप माना जाता है, कहा जाता है कि इसका निर्माण पुरी के महंत द्वारा किया गया था। ब्रह्मवैवर्तपुराण में काशी में स्‍थापित सात पुरियों की स्थिति के अनुसार यह हरिद्वार क्षेत्र के रुप में मान्‍यता रखता है। घाट पर ही अन्‍य नृसिंह, बाणेश्वर और मयूरेश्वर आदि मंदिर मौजूद हैं। 

3- शिवाला: शिवाला घाट की भी अपनी प्राचीन मान्‍यता है। यहां पर माता आनंदमयी का पुराना आश्रम मौजूद है। माता आनंदमयी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की गुरु थीं और काशी में इसी आश्रम में रहती थीं। पीएम नरेंद्र मोदी इस आश्रम में 2014 में जीत हासिल करने के बाद दर्शन और पूजन के लिए जा चुके हैं। यहीं पर ही महिषा सुरमर्दिनी का प्राचीन मंदिर भी शामिल है जो नवरात्रि में लोगों की आस्‍था का प्रमुख केंद्र बना रहता है। 

4- भदैनी: मान्‍यता है कि यहां रानी लक्ष्‍मी बाई का बचपन बीता था, उनका जन्म यहीं हुआ था। यह क्षेत्र पेशवाओं का गढ माना जाता है। इस क्षेत्र में बंगाली, मद्रासी, पेशवा मराठी सहित दक्षिण भारतीय लोगों का निवास स्‍थान भी माना जाता है।

 

5- हरिश्‍चंद्र घाट मार्ग : ऐसी मान्यता है कि सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र सत्य की रक्षा के लिए काशी के इस श्मशान घाट पर स्वयं ही बिके थे, इस वजह से इस घाट का नाम हरिश्चन्द्र घाट पड़ा। यह काशी के दो श्मशान घाटों में से एक है। इस घाट पर शवदाह कब से आरंभ हुआ इसका कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है, इस घाट पर 15-16वीं शताब्दी के सती स्मारक इस बात के प्रमाण हैं कि उस समय यहां श्मशान घाट था। ग्रन्थों के अनुसार यहां प्राण त्यागने वाले को भैरवी यातना से मुक्ति मिलती है और वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है। वर्तमान के घाट पर केवल शवदाह का कार्य सम्पन्न होता है। सन् 1988 के पूर्व यह घाट बालू क्रय-विक्रय का केन्द्र था परन्तु घाट का पक्का निर्माण हो जाने के बाद यह प्रतिबन्धित हो गया और इसी समय यहां विद्युत शवदाह गृह का भी निर्माण हुआ जो परंपरागत शवदाह के साथ-साथ चलता रहता है। घाट पर तीन प्रमुख शिव मंदिर हैं, जिसमें सन् 1960 में निर्मित काशी कामकोटीश्वर मंदिर (शिव मंदिर) प्रमुख है।

7- सोनारपुरा: पुरनिए मानते हैं कि बंगाल से दो कारोबारी मदन कुमार मुखर्जी और सोना बाबू यहां बहुत पहले कारोबार के उददेश्‍य से आए और यहीं पर बस गए। उनके नाम से ही मदनपुरा और सोनारपुरा क्षेत्र आज भी बसा हुआ है। मदनपुरा में योगी श्यामा चरण लाहड़ी का पुराना आश्रम भी है। यहीं प्राचीन दुर्गा मंदिर है जो 250 साल पुराना है। इतना ही नहीं यहां तीन प्राचीन कालेज सीएम ऐंग्लो बंगाली स्कूल, बंगाली टोला इंटर कालेज और दुर्गाचरण कन्या इंटर कालेज भी है। यहां का पुराना बाजार भी काफी प्रसिद्ध है, पूर्वांचल के काफी कारोबारी यहां के बाजार से काफी लंबे समय से जुडे रहे हैं। काशी का यह प्रमुख कारोबार का क्षेत्र रहा है।  सोनारपुरा में ही गौरी केदारेश्‍वर का प्रमुख मंदिर है। 

8- पांडेय हवेली: सोनारपुरा और मदनपुरा के बीच पांडेय हवेली क्षेत्र है। यहां पर तिलभांडेश्‍वर महादेव का प्राचीन मंदिर स्‍थापित है। वहीं दूसरी ओर सहस्रकाली मंदिर भी लोगों की आस्‍था का केंद्र है। यहां गंगा तट स्थित पांडेय घाट भी है जहां धार्मिक आयोजन नैत्यिक क्रम में होते हैं। यहां पर हिंदू और मुस्लिमों की मिश्रित आबादी रहची है। स्‍थानीय लोग परंपरागत कारोबार से जुडे हुए हैं। यहां पर बनारसी साडी का कारोबार और बनारस का फर्नीचर कारोबार प्रमुख तौर पर पूर्वांचल में अपनी पहचान रखता है।  

9- मदनपुरा : माना जााता है कि मदन कुमार मुखर्जी के नाम पर मदनपुरा क्षेत्र बसा हुआ है। मदनपुरा क्षेत्र काशी में काफी पुराना है। इस क्षेत्र में पुराने काशी की काफी मुस्लिम आबादी रहती करती है। यहां पर निवास करने वाली अधिकतर मुस्लिम आबादी कारोबार और लघु उद्यम से जुडी हुई है। यहां बुनकर और सजावटी सामानों का कारोबार करने वाले लंबे समय से काशी की अर्थव्‍यवस्‍था की रीढ बने हुए हैं। यहां के बने उत्‍पाद विदेशों को भी निर्यात किए जाते हैं।  

मैप में देखें कहां-कहां से होकर गुजरेगा पीएम मोदी का काफिला:

10- जंगमबाड़ी : काशी में मठों की परंपरा काफी पुरानी है। सबसे प्रचीन मठ की बात की जाये तो यह गौरव जंगमबाड़ी मठ को प्राप्त है। पहले इस मठ को हरिकेश आनंदवन नाम से जाना जाता था। जंगमबाड़ी अर्थात शिव को जानने वालों के रहने का स्थान। काशी का यह अति प्राचीन मठ अपने आप में इतिहास के कुछ उस हिस्से को समेटे हुए है जिसकी तस्वीर अमूमन लोगों को देखने के लिए नहीं मिलती है। इस मठ को भारतीय राजाओं के अलावा कट्टर मुस्लिम शासकों ने भी काफी कुछ दान किया। दान की गई कुछ वस्तुओं को आज भी मठ में जीर्ण-शीर्ण अवस्था में संरक्षित किया गया है। इस ऐतिहासिक एवं प्राचीन मठ की स्थापना छ्ठवीं शताब्दी में हुई। हालांकि, कहा जाता है कि यह इससे भी पुराना रहा है। यह मठ शैव सम्प्रदाय का प्रमुख केंद्र रहा है। इस सम्प्रदाय में विश्वास रखने वाले साधु-संतों का यहां आना-जाना लगा रहता है साथ ही बहुत से महात्मा स्थायी निवास करते हैं।

 वीरशैवमत के संस्थापक पंचाचार्यों में से एक विश्वाराध्य जी ने इस मठ की स्थापना की थी। इतिहास के पन्नों में झांक कर देखें तो इस मठ को मुस्लिम शासक हुमायूं, अकबर, जहांगीर, शाहजहां, औरंगजेब एवं मुहम्मद शाह समेत अन्य शासकों ने दान दिया। हुमायूं ने मठ में रह रहे साधुओं के लिए तीन सौ बीघा जमीन दान दी। इसी तरह अकबर ने 480 बीघा जमीन मठ को दान की थी। जिसका उल्लेख दानपत्र में किया गया है। वहीं कट्टर मुस्लिम शासक औरंगजेब ने भी मठ के लिए दान दिया था। आज भी औरंगजेब का हस्ताक्षर किया हुआ पत्र मठ में संरक्षित करके रखा गया है। वहीं काशी के राजा जयनन्ददेव ने भी इस मठ को दान किया।

जिसका विवरण महाराजा प्रभुनारायण सिंह ने एक ताम्रपात्र पर लिखवाया था जो आज भी मठ में सुरक्षित रखा गया है। कहा जाता है कि पहले काशी विश्वनाथ मंदिर जंगमबाड़ी मठ के ही अधीन था। बाद में मठ से यह अधिकार ले लिया गया। हालांकि आज भी मठ में विश्वनाथ जी के श्रृंगार वाले दिन सजने वाली चांदी की पंचमुखी शिवमूर्ति रखी हुई है। इस मठ की ऐतिहासिक महत्ता इसलिए भी बढ़ जाती है कि यहां बैठकर इसके प्रथम आचार्य ने उपदेश दिया था। मठ में पुस्तकालय भी है। इस पुस्तकालय में प्राचीन संस्कृति सभ्यता एवं इतिहास से जुड़े दुर्लभ संग्रह मौजूद हैं। साथ ही यहां संग्रहित उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद्र का ‘गबन’ ‘गोदान’ और ताड़ पत्रों पर लिखे प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथ एवं ताम्रपत्र एवं ताइपत्र पर लिखने के साधन सहज ही लोगों को आकर्षित करते हैं। 

जंगमबाड़ी के बारे में कहा जाता है कि इस मठ में भगवान विश्वाराध्य जी का ज्ञानपीठ स्थापित है। वीर शैवमत के संस्थापक जगतगुरू पंचाचार्य पृथ्वी पर शिवलिंगों से अवतार लेकर शिवसिद्धांत तथा शिवभक्ति का प्रचार करते हैं। इस मठ से दक्षिण भारतीयों का अधिक जुड़ाव रहा है। काशी आने वाले अधिकतर दक्षिण भारतीय इस मठ में आते हैं। वर्तमान में यह मठ 50 हजार वर्गफुट में स्थापित है। इस मठ का मुख्य द्वार सोनारपुरा से गोदौलिया जाने वाले मार्ग पर स्थित है। मुख्य द्वार के बाद धर्मरत्न कल्याणी महाद्वार है। इसके बाद शिव मंदिर है।

11- गोदौलिया: गोदौलिया क्षेत्र प्राचीन काशी का गंगा तट स्थित वह स्‍थान है जहां पुरानी काशी की बसावट है। गोदौलिया क्षेत्र में कई प्रमुख मंदिर स्‍थापित हैं साथ ही यहां काशी का पुराना दशाश्‍वमेध मार्केट भी मौजूद है जहां कपडों से लेकर धर्म आधारित दुकानों की बहुलता है। यह कभी शहर का पुराना बाजार हुआ करता था। दशाश्‍वमेध सहित कई प्रमुख घाटों पर जाने का रास्‍ता यहीं से हाेकर गुजरता है। बाबा दरबार का गेट भी इसी क्षेत्र में मौजूद है। सुबह से शाम तक धार्मिक कार्यों के लिए यहां से लोगों का नियमित गुजरना होता है। शहर का सबसे व्‍यस्‍त इलाका होने की वजह से यह क्षेत्र हमेशा लोगों से गुलजार रहता है। प्राचीन मान्‍यताओं के अनुसार गुप्त गोदावरी नदी यहां से होकर बहती है। इसलिए इसका नाम अपभ्रंश हाेकर कालांतर में गोदौलिया के नाम से ही जाना जाने लगा।

मान्‍यता यह भी है कि पहले यहां पर नदी की धारा भी थी और पास में अगस्त्य मुनि का मंदिर भी है।  यह मठ केवल धार्मिकता एवं पूजा-पाठ संतों साधुओं तक ही सीमित नहीं है बल्कि सामाजिक दायित्व का भी निर्वहन कर रहा है। मठ में विद्यार्थियों के रहने एवं खाने की व्यवस्था निशुल्क है। वहीं गरीब छात्रों को मेडिकल एवं इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए मठ की ओर से छात्रवृत्ति भी प्रदान की जाती है। साथ ही काशी दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं के लिए चिकित्सा सुविधा भी की जाती है एवं विधि विधान से पूजा पाठ की व्यवस्था की जाती है। मठ की ओर से समय-समय पर कई मंदिरों का जीर्णोद्धार भी किया गया है। इतना कुछ समेटे यह ऐतिहासिक मठ वर्तमान में काशी का धरोहर बन चुका है। जिसके अतीत से जुड़ा हुआ है बेहतरीन इतिहास। जो हमारी समृद्ध सांस्कृतिक एवं धार्मिक सम्पदा का दर्शन कराता है।

 

12- दशाश्‍वमेध घाट :  दशाश्‍वमेध घाट पर नैत्यिक गंगा आरती का अनवरत क्रम चलता है। मान्‍याता है कि वर्ष 1735 में घाट का निर्माण मराठा बाजीराव पेशवा ने कराया था। घाट का विस्तार अहिल्याबाई घाट से लेकर राजेन्द्रप्रसाद घाट तक माना जाता है। मान्‍यता है कि ब्रह्मा जी ने काशी के इसी गंगा तट पर दस अश्वमेघ यज्ञ आयोजित किया था इसलिए कालांतर में घाट का नाम दशाश्‍वमेध घाट पड गया। एक दूसरी मान्‍यता यह भी है कि भारशिव राजाओं ने कुषाणों को हराने के बाद दस अश्वमेध यज्ञ करने के पश्चात यहां गंगा स्‍नान करने के बाद घाट का नाम दशाश्वमेध घाट पड़ा। हालांकि प्राचीन दस्‍तावेजों में रूद्र सरोवर घाट के तौर पर भी इसकी मान्‍याता है। यहां स्नान मात्र से समस्त पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति की मान्‍यता है। 

काशी के प्रमुख चौरासी घाटों में यह सबसे प्रमुख घाट है। मत्यस्यपुराण में इसे काशी के पांच प्रमुख तीर्थों में मान्‍यता दी गई है। घाट पर गंगा, काली, राम पंचायतन व शिव मंदिर स्‍थापित हैं। चैत्र के प्रथम मंगलवार को होने वाला बुढ़वा मंगल विशेष रूप से मनाया जाता है। देशी-विदेशी सैलानियों के लिये यह घाट वाराणसी का केन्द्र माना जाता है। वर्ष1965 में राज्य सरकार ने घाट का नए सिरे से निर्माण कराया था। इसी घाट पर पीएम नरेंद्र मोदी और जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे ने 12 दिसंबर 2015 को गंगा आरती की थी। इसके बाद से ही घाट के बारे में देश और विदेश में पहचान बनी। 12 मार्च 2018 को फ्रांस के राष्‍ट्रपति इमैनुएल मैक्रां भी गंगा में नौका से भ्रमण करने के बाद इस घाट पर पीएम नरेंद्र मोदी के साथ आए थे। 

Posted By: Ayushi Tyagi

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