गाजियाबाद, मनीष शर्मा। 'दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों' मकबूल शायर बशीर बद्र का यह नसीहत भरा शेर कई मौकों पर सटीक बैठता है। सियासत पर कुछ ज्यादा ही। राजनीति में अक्सर समीकरणों के मद्देनजर दोस्त दुश्मन बन जाते हैं और कई बार दुश्मनों से याराना हो जाता है। धुरविरोधी सपा और बसपा की दोस्ती इसकी एकदम ताजातरीन बानगी है। हालांकि फिलहाल मुझे बशीर साहब के यह क्रांतिकारी अल्फाज 2009 के किस्से के साथ याद आए हैं। किस्सा राजनाथ सिंह की गाजियाबाद में चुनावी आमद का और किस्सा बाबूजी की सियासी बिसात का।

गाजियाबाद लोकसभा सीट जहां भाजपा के लिए पिछले कई चुनावों से ‘नाक’ का सवाल रही है, वहीं दिल्ली से नजदीकी के कारण वीआईपी का दर्ज भी इस लोकसभा क्षेत्र को हासिल है। यही कारण है कि पिछले कुछ चुनावों से भारतीय जनता पार्टी भी यहां दिग्गजों पर ही दांव खेलती है। 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह यहां से चुनाव लड़ने को आए। अब भाजपा अध्यक्ष के लिए ही अगर चुनाव चुनौती बन जाए तो इससे बड़ी खतरे की घंटी क्या हो सकती है?

यही सोचकर शायद उस समय सपा में आए सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री और अब राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह ने नाथ का राज छीनने के लिए ऐसी बिसात बिछाई, जिसे राजनीतिक जानकार चटखारे ले-लेकर सुनते- सुनाते हैं। सियासी व्यूह रचना में अक्सर किसी प्रत्याशी को हराने के लिए उसी के समाज से ताल्लुक रखने वाले वोटकटवा प्रत्याशी खड़े किए जाते रहे हैं। लेकिन, 2009 के चुनाव में एक नई चाल के तहत समाजवादी पार्टी ने भाजपा प्रत्याशी राजनाथ सिंह के खिलाफ अपना उम्मीदवार ही नहीं उतारा। कल्याण सिंह तब सपा में थे और मुलायम सिंह यादव के बेहद करीबी भी।

जानकार बताते हैं कि कल्याण सिंह की सलाह पर ही मुलायम सिंह ने यह दांव खेला था। राजनाथ सिंह का कड़ा मुकाबला कांग्रेस से पूर्व सांसद सुरेंद्र प्रकाश गोयल और बसपा के अमरपाल शर्मा से था। इससे ठीक पहले कार्यकाल यानी 2004 में सुरेंद्र प्रकाश गोयल सांसद थे और शहर विधायक रहते हुए लोकसभा का चुनाव जीत सांसद बने थे। इससे पहले वह तीन बार नगर पालिका के चेयरमैन भी रहे। मुस्लिम इलाकों में भी उनकी खासी पकड़ थी। पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की सोच थी कि मुस्लिम मतदाता कांग्रेस के पक्ष में एकतरफा हो जाएं तो राजनाथ सिंह के लिए लोकसभा की राह आसान नहीं होगी। अगर सपा प्रत्याशी उतारती है तो मुस्लिम मत बंट जाएंगे।

हालांकि उस चुनाव मैदान में इकबाल, अजीज खान, केजेड बुखारी व अनवर अहमद बतौर मुस्लिम प्रत्याशी खड़े हुए। लेकिन चारों को मिलाकर तकरीबन नौ हजार वोट भी नहीं मिले। मुलायम का साथ पाकर कठोर हुए कल्याण सिंह की बिसात गहरी थी, मगर भाजपा के थिंकटैंक ने इसे ही मोहरा बना लिया। बताते हैं कि पूरे चुनाव भाजपा के झंडाबरदारों ने यहीं प्रचार किया कि कल्याण सिंह और मुलायम सिंह यादव ने यह साजिश राजनाथ सिंह को हराने के लिए रची है। इस कारण ऐन वक्त पर भाजपा के परंपरागत वैश्य वोटबैंक ने बिरादरी के बजाय भगवा को तवज्जो दी। नतीजतन, मौजूदा गृहमंत्री राजनाथ सिंह तब लगभग 90 हजार मतों से चुनाव जीत गए। बहरहाल, राजनाथ सिंह के साथ-साथ अब कल्याण सिंह भी भाजपा में हैं। इधर, चुनावी रणभेरी के बीच मौके के साथ दस्तूर भी बना तो यह ‘कलमी राय’ अचानक याद आ गई। 

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