नई दिल्ली[सौरभ श्रीवास्तव]। भाजपा की रणनीति का ही असर रहा कि दक्षिणी दिल्ली से कांग्रेस उम्मीदवार विजेन्दर सिंह, आम आदमी पार्टी के चांदनी चौक से प्रत्याशी पंकज गुप्ता, नई दिल्ली से प्रत्याशी बृजेश गोयल और उत्तर पूर्वी दिल्ली से दिलीप पांडेय की जमानत जब्त हो गई। कुल वैध मतों का छठवां हिस्सा भी ये उम्मीदवार प्राप्त नहीं सके।

कांग्रेस के पास इस चुनाव में खोने के लिए कुछ नहीं था, लेकिन अपना खोया जनाधार वापस पाने के लिए उसने चुनाव में अपने सर्वाधिक मजबूत नेताओं को उतारा। मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष व तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित के नेतृत्व में चुनाव लड़कर कांग्रेस ने सीट तो नहीं जीती और दक्षिणी दिल्ली सीट से उसके सेलेब्रिटी उम्मीदवार बॉक्सर विजेंदर सिंह की जमानत जब्त हो गई, लेकिन पार्टी का पांच सीटों पर दूसरे नंबर पर आ जाना उसके लिए संतोषजनक जरूर कहा जा सकता है। कांग्रेस का यह प्रदर्शन दर्शाता है कि उसने आप की तरफ खिसका अपना वोटबैंक हासिल करने में काफी हद तक सफलता हासिल की है, जो अगले विधानसभा चुनाव में उसे लड़ाई में अवश्य रखेगा।

पिछले लोकसभा चुनाव की तरह इस बार भी दिल्ली देश के साथ कदम से कदम मिलाती नजर आई। जहां देश के कई राज्य मोदीमय हो गए, वहीं दिल्ली ने भी भाजपा को निराश नहीं होने दिया। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी के नेतृत्व में पार्टी के सातों प्रत्याशियों ने अपनी-अपनी सीट पर कमल खिलाकर यह साबित कर दिया कि दिल्ली के लोगों का मिजाज देश से अलग कतई नहीं है।

इन नतीजों में दिल्ली ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथ भी मजबूत किए और अनेक रिकॉर्ड तोड़ते हुए भाजपा को गर्व करने के कई कारण भी दिए। दिल्ली में भाजपा के लिए मौजूदा लोकसभा चुनाव के नतीजे कई मायनों में अहम रहे। ऐसा पहली बार हुआ जब किसी लोकसभा चुनाव में भाजपा ने दिल्ली में करीब 57 फीसद मत हासिल किए।

इससे पूर्व भाजपा का अधिकतम मत प्रतिशत वर्ष 1999 में 51.7 फीसद रहा था। यह भी पहली बार ही हुआ, जब लगातार दो लोकसभा चुनाव में भाजपा ने दिल्ली में सातों सीटों पर जीत दर्ज की। वर्ष 2014 से पहले सिर्फ एक बार 1999 में ही पार्टी ने राजधानी में सातों सीटों पर जीत हासिल की थी, लेकिन वर्ष 2004 में हुए अगले चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा से छह सीटें झटक ली थीं।

दिल्ली में हुए लोकसभा चुनावों में भाजपा के मामले में ऐसा भी पहली बार ही देखने को मिला कि सातों सीटों पर दूसरे और तीसरे नंबर पर रहे प्रत्याशियों के कुल मतों को जोड़ लिया जाए तो भी वह भाजपा प्रत्याशी के मतों तक नहीं पहुंच सके। इन अभूतपूर्व नतीजों से इतर मौजूदा चुनाव में यह भी उल्लेखनीय रहा कि पार्टी के सभी प्रत्याशी भारी अंतर से विजयी रहे।

इनमें से पश्चिमी दिल्ली सीट पर प्रवेश वर्मा और उत्तर-पश्चिमी दिल्ली सीट पर हंसराज हंस को आठ लाख से भी अधिक मत मिले और उनकी जीत का अंतर पांच लाख से भी अधिक रहा।

वहीं, उत्तर- पूर्वी दिल्ली सीट से मनोज तिवारी को भी आठ लाख के करीब मत प्राप्त हुए। इस चुनाव में दिल्ली में यदि सबसे ज्यादा किसी को नुकसान हुआ, तो वह आम आदमी पार्टी (आप) है। पिछले विधानसभा चुनावों में वह 70 में से 67 सीटें जीतकर दिल्ली के सियासी परिदृश्य पर छा गई थी।

इसके बाद हुए नगर निगम चुनावों में भले ही उसकी करारी हार हुई, लेकिन बाद में बवाना विधानसभा उपचुनाव जीतने पर पार्टी के हौसले बढ़ गए थे और वह लोकसभा चुनावों में भाजपा को हराने की रणनीति बनाने लगी थी। करीब दस माह पूर्व प्रत्याशियों को क्षेत्र में प्रचार के लिए उतारकर पार्टी ने अपनी मंशा भी साफ कर दी थी। जब उसे लगा कि अकेले भाजपा को नहीं रोक सकेगी तो उसने कांग्रेस के साथ गठबंधन की भी भरपूर कोशिश की।

हालांकि गठबंधन सिरे नहीं चढ़ा, इसके बाद भी उसे उम्मीद थी कि अनियोजित कॉलोनियों और मुस्लिमों के मतों के सहारे वह भाजपा को कड़ी टक्कर जरूर दे सकेगी। केजरीवाल सरकार के साढ़े चार साल के कामकाज पर वोट मांग रही आप का सात में से पांच सीटों पर तीसरे स्थान पर खिसक जाना और उसके तीन प्रत्याशियों की जमानत तक जब्त हो जाना यह दर्शाता है कि उसके लिए भविष्य की राह बहुत आसान नहीं है।

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