नई दिल्ली [भगवान झा]। दिल्ली भव्य मंच, रोशनी की चमक-दमक, कार्यक्रम स्थल पर लगी बड़ी-बड़ी एलईडी स्क्रीनें, बड़े नेताओं के साथ सेल्फी के लिए भाग रहे कार्यकर्ता, कुछ इसी तरह का चुनावी माहौल आजकल देखने को मिल रहा है। लेकिन एक ऐसा भी दौर था जब प्रचार-प्रसार के संसाधन के नाम पर बैलगाड़ी व साइकिल हुआ करती थी। एक गांव से दूसरे गांव जाने में घंटों लग जाते थे। घर-घर जाना मुमकिन नहीं होता था, ऐसे में इलाके के बाजारों में ही सभा का आयोजन किया जाता था, ताकि कुछ लोग एक ही जगह मिल जाएं।

भाजपा के वरिष्ठ नेता धर्मदेव सोलंकी बताते हैं कि पहले बैलगाड़ी में एक-दो क्विंटल लड्डू भरकर कार्यकर्ता गांव में जाया करते थे। सबसे पहले लोगों को लड्डू खिलाया जाता था और बाद में उनसे वोट देने की अपील की जाती थी। राजधानी में वर्ष 1970 से पहले काफी कम कॉलोनियां थीं। एक गांव से दूसरे गांव की दूरी काफी थी। ऐसे में प्रत्याशी के लिए घर-घर जाना संभव नहीं हो पाता था। हर कार्यकर्ताओं का इलाका बंटा हुआ रहता था और वहां पर चुनाव प्रचार करते थे। उन्होंने कहा कि ज्यादातर सभा नजफगढ़, पालम व बवाना इलाके में होती थीं।

पहले हम इन इलाकों के बाजार में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ चुनाव प्रचार के लिए जाते थे, क्योंकि उस समय खुले मैदान में भाजपा के लिए भीड़ नहीं जुटती थी, ऐसे में हम बाजार में जाकर लोगों से मिलते थे और उन्हें भाजपा की नीतियों के बारे में बताते थे। वर्ष 1967 में लाल कृष्ण आडवाणी दिल्ली आए और यहां की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने लगे।

राजधानी में विधानसभा से पहले महानगर परिषद होता था। लाल कृष्ण आडवाणी को 1967 में महानगर परिषद का एल्डरमैन बनाया गया था। साथ ही राजधानी दिल्ली की सियासत में उनको महत्वपूर्ण स्थान दिया गया था। 1952 के चुनाव में वोट डालने के लिए राजनीतिक पार्टियों के अलग-अलग रंग के डब्बे होते थे। पीला डब्बा जनसंघ का था, वहीं सफेद डब्बा कांग्रेस का। इस दौरान पोलिंग बूथ के आसपास पेड़ों पर हर पार्टी के कार्यकर्ता चढ़ जाते थे और मतदान के लिए जा रहे लोगों से अपनी पार्टी को वोट देने के लिए प्रेरित करते थे।

इस दौरान वे पार्टी का नाम नहीं बल्कि डब्बे का रंग लोगों को बताते थे, जिससे की कार्यकर्ता के हिसाब से लोग वोट दे सकें। एक अन्य बुजुर्ग राम ¨सह बताते हैं कि कार्यकर्ताओं के साथ ढोल वाले जरूर होते थे। जब भी वे गांव में पहुंचते थे ढोल की आवाज सुनकर ही लोग समझ जाते थे कि चुनाव वाले आ गए और लोग जमा हो जाते थे।

पेड़ की छांव में होती थीं सभाएं बुजुर्ग वीरेंद्र बताते हैं कि पहले चुनावी सभा के लिए पंडाल नहीं लगते थे। इतने साधन ही नहीं थे। ऐसे में इलाके के ऐसे पेड़ का चुनाव किया जाता था, जिसकी डालियां खूब फैली हुई हों। इसी के नीचे छांव में सभा का आयोजन किया जाता था। इसके अलावा जोहड़ के किनारे पेड़ काफी होते थे। गांव में अक्सर जोहड़ के किनारे ही चुनावी बैठकें होती थीं और प्रत्याशी लोगों के सामने अपनी बात रखते थे।

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