लखनऊ [अवनीश त्यागी]। कहते हैं कि राजनीति और युद्ध में सब जायज होता है। इसी सूत्र पर गठबंधन की अदल-बदल के माहिर माने जाने वाले राष्ट्रीय लोकदल अध्यक्ष और किसानों के मसीहा स्व. चौधरी चरण सिंह के पुत्र अजित सिंह ने अपनी सियासी विरासत बचाने को सपा-बसपा से गठबंधन का नया दांव चला है। इसके लिए उन्हें हरित प्रदेश और हाईकोर्ट बेंच जैसे मुद्दों को भी भुलाना पड़ा। यही नहीं, पहली बार अपने पुश्तैनी संसदीय क्षेत्र बागपत को भी छोड़ा। अजित सिंह स्वयं मुजफ्फरनगर सीट से लड़ेंगे और अपने पुत्र जयंत चौधरी को मथुरा के बजाए पैतृक सीट बागपत से चुनाव लड़ा रहे हैैं।

बागपत को स्व. चौधरी चरण सिंह की सियासी धरोहर माना जाता है। यहां से ही चौधरी साहब का दबदबा बिहार तक चलता था। क्षेत्र की जनता हर विषम परिस्थिति में चौधरी साहब के साथ चट्टान की तरह खड़ी दिखती थी। चौधरी की मृत्यु के बाद अजित सिंह उनकी सियासी विरासत को सहेज कर न रख सके। वर्ष 1998 व 2014 में उनको पराजय का सामना करना पड़ा। गत लोकसभा चुनाव में भाजपा से हारने से ज्यादा तीसरे स्थान पर लुढ़क जाना अजित के लिए कड़वा अनुभव रहा। मुस्लिम व अन्य पिछड़ा वर्ग के वोटों के खिसक जाने से 2017 के विधानसभा चुनाव में भी रालोद की बुरी गत हुई। पार्टी ने प्रदेश में 277 उम्मीदवार उतारे थे, परंतु छपरौली सीट ही बच सकी।

अजगर और मजगर, दोनों फेल

स्व. चौधरी चरण सिंह की उत्तर भारत में राजनीतिक चौधराहट अहीर जाट गुर्जर, राजपूत (अजगर) जातियों के गठजोड़ पर चलती थी। जिसको बाद में अजित सिंह ने मजगर (मुस्लिम, जाट, गुर्जर व राजपूत गठजोड़) में बदल कर काम चलाया, परंतु सपा-बसपा की मजबूती ने मुस्लिमों को यादव व दलितों की ओर मोड़ दिया। मुजफ्फरनगर दंगे ने जाट व मुस्लिम गठजोड़ की नींव भी हिला दी, इसीलिए पहली बार अजित सिंह किसी गठबंधन में इतनी कम (तीन) सीटों पर समझौते के लिए राजी हो गए। वर्ष 1967 में कांग्रेस तोड़कर मुख्यमंत्री बने स्व.चौधरी चरण सिंह की सियासी विरासत अब मात्र तीन सीटों बागपत, मुजफ्फरनगर और मथुरा में सिमटकर रह गई है। इन सीटों पर पिता-पुत्र के अलावा केवल किसी एक अन्य को टिकट दिया जा सकता है।

यूं घटता गया रुतबा

वर्ष 1987 में जब चौधरी चरण सिंह की मृत्यु हुई, तब भारतीय लोकदल के 84 विधायक थे। यह संख्या धीरे-धीरे घटती गई। वर्ष 1999 की अटल और 2009 की कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे अजित के नेतृत्व में 2002 के विधानसभा चुनाव में श्रेष्ठ प्रदर्शन रहा था। तब भाजपा से गठबंधन में 14 सीटें जीती। 2009 में भाजपा से गठजोड़ कर लड़े लोकसभा चुनाव में पांच सीटों पर जीत मिली थी। इसके बाद 2012 में कांग्रेस गठबंधन में विधानसभा चुनाव लड़ा और 9 क्षेत्रों मेंं सिमट गए। अजित की पहचान अब एक जाट नेता के रूप में ही रह गई है। मुजफ्फरनगर दंगे के बाद भाजपा ने जाटों में भी पकड़ बना ली।

कैराना उपचुनाव में मिली संजीवनी

कैराना संसदीय उपचुनाव ने रालोद को संजीवनी दी। विपक्षी एकता के चलते रालोद की उम्मीदवार तबस्सुम हसन ने भाजपा से कैराना सीट छीनी तो यहां से सपा-बसपा के साथ रालोद गठजोड़ की बुनियाद पड़ी। जाट-मुस्लिम समीकरण फिर से बनते देखकर ही अजित सिंह ने मुजफ्फरनगर से लडऩे का मन बनाया।

48 वर्ष पूर्व हार गए थे चरण सिंह

रालोद के लिए मुजफ्फरनगर सीट को शुभ नहीं माना जाता है। वर्ष 1971 में चौधरी चरण सिंह लोकसभा का चुनाव मुजफ्फरनगर से हार चुके है। सीपीआइ के विजयपाल सिंह ने उनको हराया था और इसके बाद चरण सिंह ने बागपत को अपना सियासी क्षेत्र बना लिया था। वर्ष 2009 में रालोद प्रत्याशी अनुराधा चौधरी भी हार गई थीं।

रालोद संक्षिप्त सफरनामा

वर्ष        लड़े       उम्मीदवार जीते

2014    सात         शून्य

2009    सात          पांच

2004    दस           तीन

1999    दस            दो

वर्ष 2014 में रालोद

प्रत्याशी              सीट             वोट

अजित सिंह        बागपत         1,99,516

जयंत चौधरी       मथुरा           2,43,890

निरंजन धनकर    हाथरस         86,109

जया प्रदा            बिजनौर        24,348

अमर सिंह      फतेहपुर सीकरी   24,185

अंजू मुस्कान    बुलंदशहर          59,116

राकेश टिकैत      अमरोहा          9,539 

Posted By: Umesh Tiwari