लखनऊ [आनन्द राय]। इस शुक्रवार राकेश ओमप्रकाश मेहरा की फिल्म 'मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर' रिलीज हुई है। यह फिल्म स्लम एरिया में रहने वाले कामकाजी एक छोटे बच्चे और उसकी मां की जिंदगी पर है। मां शौच के लिए बाहर जाती है तो उसके साथ दबंग दुष्कर्म करते हैं। इसके बाद बेटा अपनी मां की पीड़ा को समझते हुए शौचालय के लिए प्रधानमंत्री को पत्र लिखता है। बच्चे के इस प्रयास की कहानी लोगों को झकझोरती है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी खुले में शौच से मुक्ति के लिए अभियान चलाया है। मोदी ने शौचालय घरों को 'इज्जतघर' का नाम दिया और अब भाजपा की सरकारें शौचालय बनाने के ऐतिहासिक आंकड़ों को दोहरा रही हैं। चुनाव की तारीख घोषित होने के ठीक बाद रिलीज हुई इस फिल्म का मकसद समझा जा सकता है।

इस डिजिटल दौर में टीवी से लेकर बड़े परदे की बात हो या फिर सोशल मीडिया, सब अपना प्रभाव छोड़ रहे हैं। हाल में कुछ फिल्मों के रिलीज होने के बाद यह आरोप भी लगे कि भाजपा सरकार के प्रभाव में ऐसी फिल्में दिखाई जा रही हैंं। निश्चित तौर पर राजनीतिक विचारधारा को प्रभावित करने वाली इन फिल्मों ने समाज में नई बहस छेड़ी है।

इस वर्ष जनवरी में दो फिल्में एक साथ रिलीज हुई। संजय बारू की 2014 में आयी किताब 'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' पर इसी शीर्षक से विजय रत्नाकर की फिल्म और आतंकवादियों द्वारा उरी हमले पर आदित्यधर निर्देशित 'उरी द सर्जिकल स्ट्राइक' परदे पर आई तो दो बात बिल्कुल साफ थी। 'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' कांग्रेस हुकूमत पर निशाना साधती है। यह दस वर्षों की मनमोहन सिंह की हुकूमत को रिमोट से संचालित होते प्रदर्शित करती है, जबकि दूसरी तरफ 'उरी द सर्जिकल स्ट्राइक' प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के त्वरित फैसला लेने और पाकिस्तान के खिलाफ दम ठोंकने की कहानी दोहरा रही है। लोकसभा चुनाव से पहले जारी हुई इन दोनों फिल्मों की कहानी बड़ी बारीकी से देश के दो बड़े दलों की विचारधारा को अलग-अलग मुकाम देती हैं।

सिनेमा पर गहरी पकड़ रखने वाले शिक्षक विपिन बिहारी श्रीवास्तव कहते हैं कि सिनेमा भी अब प्रचार के माध्यम हैं और इनका मकसद साफ नजर आता है। हालांकि दानिश अहमद इस पर घोर आपत्ति करते हैं। उनका कहना है कि यह तो जबरन विचारधारा थोपने जैसा है।

अगर बहस को अलग नजरिये से भी देखे तो पिछले वर्ष के समापन के समय शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने अयोध्या का पहली बार दौरा किया। भाजपा पर खूब गरजे-बरसे लेकिन, बाद में उनका समझौता भी हो गया। लेकिन, उसी बीच शिवसेना संसदीय दल के नेता संजय राउत की बनाई फिल्म ठाकरे रिलीज हुई। उप्र में इसके प्रमोशन पर भी जोर दिया गया। ठाकरे देखने वालों ने कहा कि यह शिवसेना का वोट बढ़ाने का प्रयास है। अब शिवसेना तो भाजपा के समर्थन में है तो जाहिर है कि इसका लाभ भी उसे ही देने की शिवसेना कोशिश करेगी।

एयरलिफ्ट, परमाणु द स्टोरी आफ पोखरण, कमांडो, गाजी अटैक, राजी जैसी अनेक फिल्में हैं जिन्होंने राष्ट्रवाद की भावना को बढ़ाया है। अभी भी चुनाव समाप्त होने तक कई फिल्में रिलीज होने की कतार में हैं।  

Posted By: Umesh Tiwari