मेरठ [रवि प्रकाश तिवारी]। राजनीति की बिसात पर सियासी मोहरे शह-मात का खेल शुरू भी कर चुके हैं। वादों-शिकायतों की बैलेंस शीट का मिलान होने लगा है। चाबी एक बार फिर जनता के हाथ आ गई है। जनता के बीच रहकर समाज के मर्म को कलमबद्ध करने वाले साहित्य सृजनकर्ता भी अपनी महती भूमिका के साथ तैयार हैं। ऐसे तमाम विषयों पर मतदाता को आगाह करने, उन्हें राह दिखाने और मौजूदा राजनीतिक हालात पर बेबाक टिप्पणी के लिए मशहूर शायर और कवि सैयद एजाजुद्दीन शाह उर्फ पॉपुलर मेरठी अपनी बात रखने में कभी हिचके नहीं।

प्रस्तुत हैं इन्हीं तमाम विषयों पर उनसे बातचीत के मुख्य अंश-

-उप्र में मेरठ-एनसीआर से चुनावी यज्ञ शुरू हो रहा है। देश के माहौल और राजनीतिक उठापठक को आप किस तरह देखते हैं?

हालात देख ही रहे हैं आप समाज के क्या हैं। गठबंधन बन रहे हैं, बहुत-सी सियासी पार्टियां जमा हो रही हैं। सबकी कोशिश यही है कि मोदी को हराया जाए, उधर भाजपा भी पूरी ताकत से खड़ी है। चुनाव है, सबको अपनी बात कहने का हक है। सब कहेंगे भी, मैंने भी कहा है ...नेताओं की विशेष किस्मों पर लिखा है ताकि जनता संभल जाए, परखकर-समझकर वोट करे।

खुशी की भीड़ में सदमों के बम नहीं मिलते।

नए जमाने के नेता को गम नहीं मिलते।।

जिसे भी मिलना हो हमसे कभी, अभी मिल ले।

चुनाव जीतने के बाद हम नहीं मिलते।।

-आज राजनीतिक शुचिता कितनी मायने रखती है, मौजूदा हालात को आप किस तरह से देखते हैं?

राजनीति में अच्छे लोग हैं लेकिन, शुचिता का संकट भी बढ़ता जा रहा है। कभी हम व्यंग्य लिखते थे शर्मिंदा करने के लिए लेकिन, आज नेताओं की यह क्वालिटी हो गई है। मेरी कुछ लाइनें सुन लीजिए, समझ में आ जाएगा-

कभी इसे कभी उस पार्टी को छोड़ देता हूं।

मैं सबके वास्ते अपनी खुशी को छोड़ देता हूं।।

जहां के लोग मेरी असलियत पहचान जाते हैं।

कसम भगवान की मैं उस गली को छोड़ देता हूं।।

-चुनाव की बात विकास से शुरू की जाती है लेकिन, मतदान का आधार अंतत: जाति-धर्म बनता है। इन वजहों से सामाजिक ताना-बाना भी बिगड़ता है। आप क्या मानते हैं कि इस बार तस्वीर बदलेगी या हालात वैसे ही रहेंगे?

यही विडंबना है। चुनाव न हो तो इतना जहर भी न फैले समाज में। छोटे से स्वार्थ के लिए हम बंट गए हैं लेकिन, गलती हमारी भी है। हमें भी ठानना होगा कि हम एक हैं और सही का ही चुनाव करेंगे, धर्म-जाति-मजहब से उठकर। एक बार ऐसा हो गया तो देखिए, इन्हें भी रणनीति बदलनी पड़ेगी। आइए हम आवाज लगाएं...

जय राम तुम भी आओ, सुलेमान तुम भी आओ।

जोजफ चचा के साथ कमर खान तुम भी आओ।।

सतबीर को बुलाकर बलवान तुम भी आओ।

तुम हमसे अलग क्यों हो श्रीमान...तुम भी आओ।।

-भाजपा बम बरसाने की बात भूलने नहीं देना चाहती, कांग्रेस राफेल उड़ा रही है, गठबंधन सुबूत मांग रहा है ...आप क्या कहेंगे?

कहा न, सबके अपने मुद्दे और अपने तरीके हैं लेकिन हां, बात जब वतन की हो तो उसपर कोई समझौता न हो। राजनीति न हो। कोई शंका न हो, सवाल न हो। बस।

दुश्मन चाहते हैं तना और तनी रहे।

आपस में क्या है फायदा हरदम ठनी रहे।।

भारत के सब सपूत हैं, क्यों दुश्मनी रहे।

पुरखो की शान जैसी थी...वैसी बनी रहे।।

-राजनीति के मंचों पर भाषाई मर्यादा तार-तार हो रही है। आप कलमकार हैं, कुछ कहना चाहेंगे?

देखिए, नेता आइकॉन होता है। वह जो करता है, लाखो लोग उसकी तरह करना चाहते हैं। ऐसे में लीडर की एक गलत हरकत समाज में विघटन लाती है। वैसे भी राजनीति में आज का दुश्मन कल का दोस्त संभव है, इसलिए इतना स्पेस तो हो कि कल हम मिलें तो हमारी जगहंसाई न हो। इसे यूं समझें...

हरगिज न गमजदों को हिकारत से देखिए।

अच्छा ये है कि सबको मोहब्बत से देखिए।। 

Posted By: Umesh Tiwari

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप