लखनऊ [अजय जायसवाल]। तकरीबन 23 करोड़ की आबादी वाले उत्तर प्रदेश की राजनीति में वैसे तो दलितों से लेकर पिछड़े और अल्पसंख्यकों की भी अहम भूमिका है लेकिन, 20 फीसद सवर्णों की आबादी चुनावी हवा का रुख मोडऩे में सक्षम है। राज्य की तकरीबन 40 लोकसभा सीटों पर सवर्णों की निर्णायक भूमिका रहती है।

पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा राज्य की 80 में से रिकॉर्ड 73 (सहयोगी अपना दल की दो सीटें सहित) सीटों पर कब्जा जमाने में कामयाब रही तो इसमें इन मतों का बहुत योगदान रहा था। इनमें से 37 सीटें तो ऐसी मानी जाती हैैं, जिन पर भाजपा की जीत अपर कास्ट के वोटरों ने ही तय की थी। माना जाता है कि पिछले लोकसभा चुनाव में तकरीबन 80 फीसद सवर्ण मतदाताओं ने भाजपा का साथ दिया था।

वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा की बड़ी जीत के पीछे सवर्ण वोटरों की ही अहम भूमिका मानी जाती है। पार्टी के सर्वाधिक 44 फीसद यानी सवा सौ से अधिक सवर्ण विधायक जीते थे। भाजपा प्रत्याशियों की जीत या हार में 50 फीसद योगदान सवर्ण वोटरों का ही रहा है। नगरीय निकायों के चुनाव में भी भाजपा ने सवर्ण मतदाताओं के दम पर वर्चस्व कायम किया है।

केंद्र व राज्य में सत्ता होने के बावजूद सूबे में भाजपा के सामने लोकसभा चुनाव में इस बार सबसे बड़ी चुनौती सपा-बसपा और रालोद का गठबंधन है। माना जा रहा है कि तीनों पार्टियों के एकजुट होकर चुनाव लडऩे से सबसे ज्यादा नुकसान भाजपा को ही होगा। पिछले चुनाव में सपा व बसपा के अलग-अलग लडऩे से वोटों के बिखराव का सबसे अधिक फायदा भाजपा को ही मिला था। ऐसे में भाजपा के लिए राज्य में अपने पुराने प्रदर्शन को दोहराना कहीं बड़ी चुनौती है। मोदी सरकार द्वारा एससी-एसटी एक्ट में संशोधन से भाजपा के प्रति इन मतों में नाराजगी है। इस नाराजगी की वजह से ही भाजपा उत्तर प्रदेश से लगे तीन राज्यों के चुनाव में सत्ता से बाहर हो गई थी।

लोकसभा चुनाव से पहले सवर्णों की नाराजगी को दूर करने के लिए मोदी सरकार ने सरकारी नौकरी और शिक्षण संस्थानों में 10 फीसद गरीब सवर्णों को आरक्षण देने जैसा ऐतिहासिक फैसला किया ताकि इस चुनाव में वह गेम चेंजर साबित हो। माना जा रहा है कि सवर्ण आरक्षण के मास्टर स्ट्रोक से मोदी सरकार के प्रति सवर्णों की नाराजगी कम होगी और उनका एक बार फिर भाजपा की ओर झुकाव बढ़ेगा। इतना ही नहीं जातीय आधार पर सूबे की सियासत में मजबूत माने जाने वाले सपा-बसपा और रालोद के गठबंधन का असर भी काफी हद तक घटेगा। भाजपा को लग रहा है कि इस एक फैसले से भी वह पिछले लोकसभा चुनाव से कहीं बेहतर नतीजे हासिल करने में कामयाब हो सकती है।

जानकारों का मानना है कि इस फैसले से सवर्ण वोटर नोटा या दूसरी पार्टी के साथ जाने के बजाय भाजपा की ओर फिर लौटेंगे, जिससे उत्तर प्रदेश एक बार फिर भाजपा के लिए केंद्र की सत्ता पर काबिज होने की मास्टर-की साबित हो सकता है। वैसे तो सवर्णों का साथ मिलने से 2007 में बसपा भी सूबे में बहुमत की सरकार बना चुकी है लेकिन, पिछले एक दशक में सवर्णों ने बसपा से किनारा किया, जिससे पार्टी पिछले चुनाव में सिफर पर सिमट कर रह गई है। हालांकि, सर्व समाज की बात करते हुए बसपा प्रमुख मायावती एक बार फिर सवर्णों को पार्टी से जोडऩे के लिए उन्हें संगठन में जगह देने के साथ ही टिकट भी दे रही हैैं।

बेरोजगारी जैसे बड़े मुद्दे को उठाकर बसपा के साथ ही सपा और कांग्रेस भी भाजपा को घेर रही है कि सवर्ण आरक्षण से कहां गरीब सवर्णों को फायदा हुआ है? कांगे्रस अबकी चुनाव में बड़ी संख्या में सवर्णों को टिकट भी देने जा रही है। पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा मंदिरों में जाने और पूजा-पाठ करने से लेकर जनेऊ दिखाने तक को भी सवर्णों में पैठ बनाने की नजर से ही देखा जाता रहा है।

ब्राह्मण सर्वाधिक

वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक सूबे की आबादी 19.98 करोड़ (वर्तमान में अनुमानित आबादी 23.11 करोड़) है। सवर्णों की आबादी का कोई अधिकृत आंकड़ा तो नहीं है लेकिन, सूबे में तकरीबन 20 फीसद आबादी सवर्णों की मानी जाती है, जिसमें सर्वाधिक लगभग 12-13 फीसद ब्राह्मण, तीन-चार फीसद क्षत्रिय, दो-तीन फीसद वैश्य, एक-दो फीसद त्यागी-भूमिहार हैैं। राज्य में अनुसूचित जाति की आबादी 4.14 करोड़ यानी लगभग 21 फीसद है। अनुसूचित जनजाति की आबादी 11.34 लाख यानी 0.6 फीसद है। ओबीसी आबादी के भी अधिकृत आंकड़े तो नहीं है लेकिन, जानकार 44 फीसद जनसंख्या ओबीसी की मानते हैं। 19 फीसद मुस्लिम आबादी में दलित व पिछड़े मुस्लिम भी हैैं।

नजर सवर्ण युवाओं पर

पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा की बड़ी जीत में युवा वोटरों की भी अहम भूमिका रही थी। किसी तरह का आरक्षण न मिलने से गरीब सवर्ण युवाओं को शिक्षा और नौकरी के उचित अवसर न मिलने से उनमें सरकार के प्रति नाराजगी बढ़ती जा रही थी। मोदी सरकार द्वारा 10 फीसद आरक्षण देने के साथ ही उच्च शिक्षा में 10 फीसद सीटें बढ़ाने को लोकसभा चुनाव के मद्देनजर सवर्ण युवाओं को साधने के तौर पर देखा जा रहा है। 

Posted By: Umesh Tiwari

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