ऋषि पाण्डे, भोपाल। कभी मप्र की राजनीति के चाणक्य माने जाने वाले अर्जुन सिंह की कर्मभूमि विंध्य क्षेत्र में उनकी पार्टी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। पिछले लोकसभा चुनाव में विंध्य की चारों सीटें जीतकर भाजपा ने जो छाप छोड़ी थी, उसका असर विधानसभा चुनाव तक दिखा। 2018 के विधानसभा, 2014 और 2009 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की जो हालत हुई थी, उससे सबक लेते हुए पार्टी ने जातिगत समीकरणों का लिहाज रखा। इसकी झलक टिकट बंटवारे में भी दिखी। दो बड़ी जातियों का गठजोड़ यदि यहां जादू दिखा गया तो इस अंचल में निर्जीव होती कांग्रेस में जान आ जाएगी। विंध्य का सियासी मिजाज शुरू से अजीब रहा है।

जब प्रदेश में भाजपा की लहर होती है तो यहां कांग्रेस बढ़त बना लेती है और जब कांग्रेस की सरकार बनने की बात आती है तो भाजपा बढ़त बना लेती है। असल में क्षेत्र के पिछड़ेपन की मुख्य वजह भी यही है। 2013 में पूरे प्रदेश में भाजपा को जब जबरदस्त सफलता मिली थी, तब यहां भाजपा और कांग्रेस लगभग बराबरी पर थे। 2018 में जब कांग्रेस की सरकार बनने की बारी आई तो कांग्रेस को यहां 30 में से छह सीटें मिलीं। पार्टी के बड़े-बड़े महारथी धराशायी हो गए। अजय सिंह, राजेंद्र सिंह और सुंदरलाल तिवारी जैसे दिग्गज नेताओं को भाजपा के साधारण दिखने वाले उम्मीदवारों ने घर बैठा दिया।

ब्राह्मण और ठाकुर उम्मीदवार उतारे कांग्रेस ने विंध्य अंचल में पहली बार नया प्रयोग किया है। तीन सीटों पर पार्टी ने ब्राह्मण और ठाकुर उम्मीदवार उतारे हैं। सीधी से अर्जुन सिंह के पुत्र अजय सिंह, सतना से राजाराम त्रिपाठी और रीवा से सिद्धार्थ तिवारी। इससे उलट भाजपा ने दो सीटें ब्राह्मण को और एक पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवार को दी हैं। सीधी में अजय के मुकाबले मौजूदा सांसद रीति पाठक को मौका दिया है। रीति ने पिछली बार कांग्रेस नेता इंद्रजीत कुमार सिंह को हराया था। इस बार रीति की स्थिति उतनी मजबूत नहीं है। इसकी वजह है पार्टी में उनके खिलाफ नाराजगी। एक पूर्व सांसद भाजपा छोड़ने का एलान कर चुके हैं। कुछ नेता

आधे-अधूरे मन से प्रचार में जुटे हुए हैं। इसके विपरीत अजय सिंह राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ते नजर आ रहे हैं।

पिछले विधानसभा चुनाव में वे अपने घर चुरहट से हार गए। यदि वे चुनाव जीत जाते तो उनकी हैसियत सरकार में कमलनाथ के बाद दूसरे नंबर पर रहती। अब हालत यह है कि कभी विंध्य के नेताओं का भाग्य निर्धारित करने वाले सिंह इस बार भी सीधी की जगह सतना से चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन पार्टी ने उनकी एक न सुनी। बसपा की मौजूदगी को अनदेखा नहीं किया जा सकता रीवा में बसपा ने विकास पटेल को उम्मीदवार बनाया है। रीवा संसदीय क्षेत्र में बसपा का मजबूत नेटवर्क है। इस क्षेत्र ने बसपा को तीन बार सांसद दिया है। सतना में भी बसपा की दमदार मौजूदगी है। कांग्रेसी दिग्गज अर्जुन सिंह और भाजपा के बड़े नेता वीरेन्द्र कुमार सखलेचा को एक ही चुनाव में बसपा उम्मीदवार ने ही पटखनी दी थी।

इस बार सतना में अच्छेलाल कुशवाह बसपा उम्मीदवार हैं जो जातिगत समीकरणों के लिहाज से भाजपा की समस्या बनते जा रहे हैं। गणेश सिंह दो चुनाव से मामूली अंतर से जीत रहे सतना में कांग्रेस ने राजाराम त्रिपाठी को उम्मीदवार बनाया है। त्रिपाठी 2009 के आम चुनाव में सपा उम्मीदवार के नाते तीसरे नंबर पर रहे थे। सतना से भाजपा उम्मीदवार और मौजूदा सांसद गणेश सिंह पिछले दो चुनावों से मामूली अंतर से जीत रहे हैं। 2014 में कांग्रेस के अजय सिंह के मुकाबले उन्हें 8600 मत ही ज्यादा मिले थे। वह भी तब जब बसपा के धर्मेंद्र तिवारी सवा लाख के करीब वोट ले गए थे।

2009 में गणेश सिंह ने बसपा के सुखलाल कुशवाहा को चार हजार मतों से हराया था। तब कांग्रेस यहां चौथे स्थान पर थी। तीसरे स्थान पर सपा के टिकट पर लड़े राजाराम त्रिपाठी थे। गणेश का यह चौथा चुनाव है। जिस तरह उनकी जीत का आंकड़ा कम होता जा रहा है, उससे लगता है कि इस चुनाव में उन्हें कड़े संघर्ष का सामना करना पड़ सकता है। अंचल की तीसरी सामान्य सीट रीवा पर भी जातिगत राजनीति का जबरदस्त प्रभाव है। यहां ज्यादातर चुनाव या तो ब्राह्मण उम्मीदवारों ने जीता या बसपा के टिकट पर पिछड़े वर्ग के नेताओं ने। राजपूत को सफलता तभी मिली है जब वह राजघराने से जुड़ा हुआ हो। इस बार भाजपा, कांग्रेस ने ब्राह्मण उम्मीदवार उतारकर बसपा के वोट बैंक को एकजुट होने का मौका दिया है।

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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