नीलू रंजन, जामनगर। डेढ़ साल पहले गुजरात विधानसभा चुनाव में बड़ी चुनौती बनकर सामने आए हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवाणी की तिकड़ी का अब निशां नहीं है। जिग्नेश मेवाणी जहां गुजरात में चुनाव प्रचार से दूर हैं, वहीं अल्पेश ठाकोर कांग्रेस से इस्तीफा देकर चुनावी प्रचार से दूर हो गए हैं। अकेले बचे हार्दिक पटेल ने कांग्रेस का दामन जरूर थामा है, लेकिन अब जमीन पर न तो रुतबा है न चर्चा। कानूनी पेंच के कारण चुनाव लड़ने से वंचित रहने वाले हार्दिक पटेल अब सौराष्ट्र के पटेल बहुल इलाके में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली बढ़त को बचाने की कोशिश में जुटे हैं।

दरअसल विधानसभा चुनाव के पहले पटेल आरक्षण के मुद्दे पर हार्दिक पटेल, ओबीसी और शराबबंदी को लेकर अल्पेश ठाकोर और दलित उत्पीड़न के मुद्दे पर जिग्नेश मेवाणी ने भाजपा सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने इन तीनों का जमकर इस्तेमाल किया और भाजपा किसी तरह अपनी सरकार बचाने में सफल रही। लेकिन डेढ़ साल बाद हालत यह है कि जिग्नेश मेवाणी ने गुजरात की चुनावी सरगर्मी से खुद को दूर कर लिया है और यहां की बजाय बिहार के बेगुसराय में कन्हैया कुमार के चुनाव प्रचार में दिख रहे हैं।

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जिग्नेश कांग्रेस के समर्थन के बल पर निर्दलीय जीते थे। जाहिर है मेवाणी की अनुपस्थिति में दलित वोटों को विधानसभा चुनाव की तर्ज पर अपने पक्ष में करना कांग्रेस के लिए मुश्किल होगा। वहीं कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतने वाले अल्पेश ठाकोर भी पार्टी से खुद को अलग कर लिया है। अभी तक अल्पेश भाजपा में शामिल नहीं हुए हैं, लेकिन यहां हर जगह चर्चा है कि वे लोकसभा चुनाव में परोक्ष रूप से भाजपा उम्मीदवारों की मदद करने में जुटे हैं।

युवाओं की नेताओं की तिकड़ी में अकेले बचे हार्दिक पटेल ने एक महीना पहले औपचारिक रूप से कांग्रेस का दामन थाम लिया है। 2015 में 21 साल के हार्दिक को आरक्षण के मुद्दे पर पटेल समुदाय का भरपूर समर्थन मिला था। हार्दिक के बलबूते पर विधानसभा चुनाव में कांग्रेस भाजपा के परंपरागत पटेल वोटों को काफी हद तक तोड़ने में सफल रही। खासतौर पर ग्रामीण इलाकों में पटेल वोटरों की भाजपा से दूरी साफ दिखी। परिणाम यह हुआ कि भाजपा को कई परंपरागत सीटों पर हार का सामना करना पड़ा।

विधानसभा चुनाव के परिणाम के आधार पर अनुमान लगाया जाने लगा था कि लोकसभा चुनाव में सौराष्ट्र की सात में तीन सीटें कांग्रेस जीत सकती हैं। दरअसल जूनागढ़ लोकसभा के मातहत आने वाली सात विधानसभा सीटों में से सभी पर कांग्रेस विजय रही थी, वहीं अमरेली में सात में से पांच और जामनगर में सात में से चार पर कांग्रेस को सफलता मिली थी। लेकिन अल्पेश, हार्दिक और जिग्णेश की तिकड़ी के बिखर जाने के बाद विधानसभा चुनाव की तुलना में स्थिति बदल गई है।

सवर्ण गरीबों को 10 फीसदी आरक्षण का प्रावधान होने के बाद पटेल आरक्षण का मुद्दा खत्म हो गया है। इसके लिए गठित पाटिदार अमानत आंदोलन समिति अभी भंग तो नहीं हुआ है कि लेकिन काम करने बंद कर दिया है। इसके छह बड़े नेताओं में से तीन चिराग पटेल, केतन पटेल और वरुण पटेल भाजपा में वहीं हार्दिक पटेल के साथ वसोया पटेल और किरति पटेल कांग्रेस में शामिल हो गए हैं।

हार्दिक के कांग्रेस में शामिल होने के बाद परंपरागत रूप से भाजपा का साथ देते आए पटेल समुदाय के लोग नाराज है। सौराष्ट्र की सीमा पर स्थित चामुंडा देवी के ट्रस्ट में पदाधिकारी राजेश भाई कहते हैं कि आखिरकार अब साफ हो गया। उनका इशारा हार्दिक के कांग्रेस इशारे पर भाजपा के खिलाफ आंदोलन शुरू करने के आरोपों की ओर था। जाहिर है बिना किसी मुद्दे के पटेल समुदाय को भाजपा से तोड़कर कांग्रेस की ओर लाना हार्दिक के लिए आसान नहीं होगा। इसके पहले केशुभाई पटेल जैसे बड़े नेता की ऐसी कोशिश को पटेल समुदाय नकार चुका है।

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Posted By: Tanisk

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