कानपुर : राजनीति ऐसा दंगल है, जिसमें आपका अपना दमखम ही सबकुछ नहीं है। यहां सफलता सही वक्त पर सही फैसला और किस्मत से मिलती है। जरा सी चूक हो जाए तो अच्छे से अच्छा सियासी पहलवान माटी में हाथ मलता रह जाए। दांव सही लगा तो माथे पर विजयश्री का तिलक लग जाए। बेशक, मौजूदा सियासत में वंशवाद, जोड़तोड़, धनबल और बाहुबल ने अपनी गहरी पैठ जमा ली हो, लेकिन ऐसे भी तमाम उदाहरण हैं, जिन्होंने गांव की पगडंडी या शहर की गलियों से राजनीति में कदम बढ़ाया। कोई पार्षद रहा, कोई प्रधान, कोई बीडीसी तो कोई ब्लॉक प्रमुख। व्यक्तित्व, आगे बढऩे की ललक, दलबदल का दांव और मेहनत से लेकर हर जरूरी कदम उठाया और सांसद बनकर दिल्ली के सबसे बड़े दरबार में जा बैठे। यही उदाहरण हैं, जो हर दल के छोटे कार्यकर्ताओं को भी बड़े सपने देखने का हौसला देते हैं। ऐसे ही कुछ उदाहरणों से रूबरू कराती जितेंद्र शर्मा की ये रिपोर्ट...

मोतीझील से संसद पहुंचे श्रीप्रकाश

कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में शुमार पूर्व केंद्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल शहर की गलियों से ही निकलकर ऊंचे मुकाम तक पहुंचे। वह पार्षद भले ही न रहे हों, लेकिन 1989 में महापौर बने। मोतीझील के सदन से सियासत करने वाले श्रीप्रकाश को 1999 में कांग्रेस ने कानपुर लोकसभा सीट का टिकट दिया तो उनकी किस्मत के द्वार खुल गए। वह 1999, 2004 और 2009 का चुनाव लगातार जीते। मनमोहन सिंह सरकार में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री और कोयला मंत्री के पद पर भी रहे।

कमलरानी वरुण : एक बार पार्षद, दो बार सांसद

वर्तमान में घाटमपुर से विधायक कमलरानी वरुण भाजपा की उन्हीं कार्यकर्ताओं में से हैं, जिन्होंने राजनीति में जमीन से सफलता के आसमान तक का सफर तय किया है। वह 1989 में सीसामऊ विधानसभा क्षेत्र के वार्ड से पार्षद चुनी गई थीं। इसके बाद 1996 और फिर 1998 में घाटमपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद बनीं। यह लोकसभा खत्म हो गई और अब घाटमपुर अकबरपुर लोकसभा क्षेत्र में है।

पार्षदी से उदय, लोकसभा में चमका किस्मत का 'भानु'

उरई, जालौन, गरौठा-भोगनीपुर संसदीय क्षेत्र से चार बार सांसद बनने वाले भानुप्रताप वर्मा 1988 में कोंच तहसील के वार्ड-16 से पार्षद चुने गए थे। 1991 से 1992 तक विधायक रहे। इसके बाद 1996, 1998, 2004 और 2014 में लोकसभा चुनाव जीतकर सांसद बने। इसी तरह 2009 के लोकसभा चुनाव में सपा से जीत हासिल करने वाले घनश्याम अनुरागी भी हमीरपुर के खेड़ा गांव के प्रधान और हमीरपुर जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुके हैं। घनश्याम अनुरागी वर्तमान में बसपा में हैं।

गांवों की सियासत से चले मुकेश और मन्नू बाबू

फर्रुखाबाद से भाजपा सांसद मुकेश राजपूत ने गांवों से अपनी सियासत का सफर शुरू किया। वह जिला पंचायत सदस्य बनने के बाद 2000 से 2005 और 2006 से 2012 तक जिला पंचायत अध्यक्ष रहे। 2014 में भाजपा ने लोकसभा का टिकट दिया और किस्मत ने उनका साथ दिया। इसी तरह 13वीं और 14वीं लोकसभा में फर्रुखाबाद से चुनकर पहुंचे चंद्रभूषण सिंह मुन्नूबाबू ने राजनीति की शुरुआत ब्लॉक प्रमुख के पद से की थी।

कदम दर कदम बढ़े रमेशचंद्र

बांदा-चित्रकूट से भाजपा के पूर्व सांसद रमेश चंद्र द्विवेदी इलाहाबाद विवि के छात्र नेता रहे। वर्ष 1982 में कौशांबी ब्लॉक से बीडीसी बने। वर्ष 1988 में ब्लॉक प्रमुख चुने गए। इसके बाद 1991 में विधायक और फिर 1998 में बांदा-चित्रकूट लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा और सांसद चुने गए।

प्रदीप ने ही खोले सैफई परिवार के लिए द्वार

समाजवादी नेता प्रदीप सिंह यादव गांव की राजनीति करते थे। ब्लॉक प्रमुख रहे। मगर, 1998 के उपचुनाव में कन्नौज से जीतकर इस सीट पर समाजवादी पार्टी का खाता खोला। उसके बाद से यह सीट सपा के कब्जे में है। मुलायम सिंह के बाद अखिलेश यादव यहां से सांसद रहे। वर्तमान में डिंपल यादव यहां से सांसद और सपा-बसपा गठबंधन प्रत्याशी हैं।

सफलता पर ही पड़ा कठेरिया का हर कदम

इटावा से सपा के पूर्व सांसद प्रेमदास कठेरिया 1995 में महेवा ब्लॉक के क्षेत्र पंचायत सदस्य बनने के बाद ब्लॉक प्रमुख बन गए थे। उसके बाद सन् 2000 से 2005 तक जिला पंचायत अध्यक्ष रहे। 2005 में फिर जिला पंचायत सदस्य बनने के बाद 2009 में लोकसभा चुनाव लड़कर सांसद बन गए।

जिला पंचायत सदस्य के रूप में की थी शुरुआत

फतेहपुर से दो बार भाजपा सांसद रहे डॉ. अशोक पटेल जिला पंचायत सदस्य व अध्यक्ष का चुनाव लड़े और जीत हासिल की। वे पहली बार 1998 और फिर 1999 में लोकसभा चुनाव जीते। इसी तरह उन्नाव के पूर्व सांसद स्व. दीपक कुमार भी कानपुर नगर निगम में पार्षद रहे थे।

Posted By: Abhishek

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