राज्‍य ब्‍यूरो, रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजनीति में अब सियासी किलों को भेदने के लिए जोरआजमाइश शुरू हो गई है। कांग्रेस व भाजपा वैसे तो सभी 11 सीटों पर अपनी रणनीति बना रही हैं, लेकिन प्रदेश की राजनीति में एक-दूसरे के धुर विरोधी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल व पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह की निगाहें एक-दूसरे के गढ़ पर टिकी हैं। दुर्ग सीएम भूपेश का है तो राजनांदगांव रमन सिंह का। राजनीति में पटखनी देने के लिए दोनों अपना घर बचाते हुए एक—दूसरे को उसके घर में हराने की रणनीति बनाने में जुटे हैं।

दुर्ग एक मात्र सीट थी, जहां पिछली बार कांग्रेस को जीत मिली थी। इस बार दुर्ग क्षेत्र से ही मुख्यमंत्री भूपेश बघेल समेत तीन मंत्री आते हैं। प्रदेश सरकार के गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू ही दुर्ग से जीते थे। ऐसे में इन सब की प्रतिष्ठा इस सीट से जुड़ी है। उधर, राजनांदगांव में पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह का वजूद दांव पर लगा है। रमन सिंह खुद इसी क्षेत्र के विधानसभा से विधायक हैं। उनके पुत्र इस सीट से सांसद हैं।

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने राजनांदगांव का किला ढहाने के लिए अपने सबसे करीबी मंत्री मोहम्मद अकबर को रणनीति बनाने की जिम्मेदारी सौंपी है। भाजपा उम्मीदवार संतोष पांडेय को वर्ष 2003 के विधानसभा चुनाव में मोहम्मद अकबर पटखनी दे चुके हैं। अकबर को चुनावी मैनेजमेंट का माहिर खिलाड़ी माना जाता है। वहीं, डॉ. रमन ने चुनाव की कमान खुद अपने हाथ में ले ली है। उनका साथ उनके बेटे अभिषेक सिंह और मधुसूदन यादव दे रहे हैं।

राजनांदगांव में रमन ने राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के दौरे से पहले तीन दिन तक लगातार चुनावी सभाएं की थीं। वहीं, मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी पूरी ताकत लगाते हुए करीब छह सभाएं राजनांदगांव में की हैं। राजनीतिक प्रेक्षकों की मानें तो मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की कोशिश है कि वह राजनांदगांव में पार्टी उम्मीदवार भोलाराम साहू की जीत तय कराकर एक तीन से दो निशाना साधें।

यहां से भाजपा उम्मीदवार की हार का मतलब होगा कि प्रदेश की राजनीति में डॉ. रमन का कद कमजोर होगा। वहीं, केंद्रीय राजनीति में भी पकड़ कमजोर होगी। इसका असर यह होगा कि डॉ रमन एक विधायक के तौर पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के निशाने पर रहेंगे।

वहीं, दुर्ग के सियासी हालात को देखें तो यहां भूपेश सरकार की साख ही दांव पर है। हालांकि, मंत्री ताम्रध्वज साहू, रविंद्र चौबे व रुद्र गुरु पर प्रतिमा चंद्राकर की जीत दर्ज कराने का जिम्मा है, मगर यहां से कांग्रेस की हार होती है, तो भूपेश का कद राहुल दरबार में कमजोर होगा।

कांग्रेस के रणनीतिकारों की मानें तो पिछले चुनाव में मोदी लहर के बावजूद दुर्ग में पार्टी की जीत हुई थी। ऐसे में इस चुनाव में परिणाम पक्ष में नहीं आते हैं तो केंद्रीय संगठन की गहरी नाराजगी उठानी पड़ सकती है। राहुल गांधी की टीम का भी दुर्ग पर फोकस है और हर चुनावी कैंपेन पर नजर रखे हुए हैं।

कांग्रेस के सामने आंतरिक गुटबाजी से निपटना बड़ी चुनौती है। टिकट बंटवारे में भी नेताओं की नाराजगी सामने आ चुकी है। ऐसे में दुर्ग और राजनांदगांव सीट पर दिग्गज नेताओं के सामने अपनी साख बचाने के साथ विरोधियों को चित्त करने की चुनौती है।

Posted By: Arun Kumar Singh

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