नई दिल्ली, अंकुर अग्निहोत्री। 133 साल पुरानी राजनीतिक पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 28 दिसंबर, 1885 को ब्रिटिश अधिकारी एओ ह्यूम, दादाभाई नैरोजी, दिनशॉ वाचा, वोमेश बनर्जी ने मिलकर की थी। ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरोध की बुनियाद पर इस पार्टी का गठन हुआ था। शुरुआत में यह पार्टी एक संगठन के रूप में काम करती थी। लेकिन 1947 में आजादी के बाद यह भारत की प्रमुख राजनीतिक पार्टी बन गई। 1952 से 2014 तक 16 आम चुनावों में से कांग्रेस ने 7 में पूर्ण बहुमत जीता है और 4 में सत्तारूढ़ गठबंधन का नेतृत्व किया। कुल 49 वर्षों तक वह केंद्र सरकार का हिस्सा रही। भारत में कांग्रेस के सात प्रधानमंत्री रह चुके हैं।

जन आंदोलन बनी कांग्रेस: 

1905 में बंगाल के विभाजन के बाद पार्टी का रुख कड़ा हुआ और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलन शुरू हए। इसी बीच 1915 में महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे और गोखले के नेतृत्व वाले उदारवादी समूह की मदद से कांग्रेस के अध्यक्ष बने। उन्होंने खिलाफत आंदोलन शुरू किया। खिलाफत आंदोलन को लेकर कांग्रेस में अंदरूनी मतभेद गहराए। चितरंजन दास, एनी बेसेंट, मोतीलाल नेहरू जैसे नेताओं ने अलग स्वराज पार्टी का गठन किया। 1929 में ऐतिहासिक लाहौर सम्मेलन में जवाहर लाल नेहरू ने पूर्ण स्वराज का नारा दिया। पहले विश्व युद्ध के बाद पार्टी में महात्मा गांधी की भूमिका बढ़ी।

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आजादी के बाद:

जवाहरलाल नेहरू के करिश्माई नेतृत्व में पार्टी ने पहले संसदीय चुनावों में शानदार सफलता पाई। नेहरू की अगुआई में 1952, 1957 और 1962 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने बहुमत हासिल किया। 1964 में नेहरू के निधन के बाद लाल बहादुर शास्त्री के हाथों में कमान गई। 1966 में ताशकंद में रहस्यमयी तरीके से उनकी मौत हो गई। अब मोरारजी देसाई को दरकिनार कर नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी के नाम पर सहमति बनी।

विभाजन:

आजाद भारत में कांग्रेस के वर्चस्व को पहली चुनौती मिली 1967 में जब विपक्ष संयुक्त विधायक दल के बैनर तले एकजुट हो गया और कई हिंदीभाषी राज्यों में कांग्रेस की हार हुई। पार्टी में विभाजन हो गया और के कामराज की अगुआई में कांग्रेस का एक अलग धड़ा कांग्रेस (ओ) के रूप में संगठित हुआ। चुनाव आयोग ने इंदिरा की अगुआई वाले धड़े को ही असली कांग्रेस पार्टी के रूप में मान्यता दी। इंदिरा ने गरीबी हटाओ का नारा दिया और 71 के चुनावों में जीत हासिल की।

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आपातकाल:

लोकसभा चुनाव में इंदिरा की जीत को अदालत ने अवैध ठहरा दिया जिसके बाद देश भर में आंदोलन शुरू हुए और इंदिरा ने 1975 में आपात काल की घोषणा कर दी। जेपी के आंदोलन ने इंदिरा सरकार को हिला कर रख दिया। 1977 में जब चुनाव हुए तो जनता पार्टी के हाथों कांग्रेस को बुरी हार का सामना करना पड़ा। दो वर्षों में ही ये सरकार गिर गई और 1980 में इंदिरा गांधी फिर सत्ता में लौटी

इंदिरा की हत्या:

1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश भर में सिख विरोधी दंगे हुए। उनकी हत्या के बाद उनके बेटे राजीव गांधी ने 84 के चुनावों में पार्टी को भारी सफलता दिलाई।1989 में जब चुनाव हुए तो जनता दल और भाजपा के गठजोड़ ने कांग्रेस को पराजित कर दिया। हालांकि ये सरकार भी दो साल ही चल पाई।

राजीव की हत्या:

1991 में चुनाव प्रचार के दौरान राजीव गांधी की हत्या हुई। पार्टी की कमान पीवी नरसिंह राव के हाथों में आई। इस चुनाव में कांग्रेस को 232 सीटें मिलीं। इसके बाद कांग्रेस का जनाधार लगातार गिरता चला गया। 2004 के चुनावों में उसे 145 सीटें मिलीं। सहयोगी दलों के सहारे संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानी यूपीए का गठन किया और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने।

सबसे खराब प्रदर्शन:

2014 में मोदी लहर के सामने कांग्रेस का अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन रहा। पार्टी 44 सीटों पर सिमट गई।

नारे निराले:

'सोनिया नहीं ये आंधी है, दूसरी इंदिरा गांधी है।' तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की छवि को बढ़ाने के लिए कांग्रेस द्वारा 2009 के लोकसभा चुनाव में ये नारा उछाला गया था। इस चुनाव में कांग्रेस सोनिया गांधी को इंदिरा गांधी के समक्ष खड़ी कर रही थी।

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Posted By: Dhyanendra Singh