नई दिल्ली। क्या एक बार फिर मोदी सरकार या फिर विपक्ष की बारी आने वाली है? तीन दशक बाद भारतीय इतिहास में जो बहुमत आया था क्या वह फिर से होगा या फिर गठबंधन में छोटे और क्षेत्रीय दलों का बोलबाला होगा? गठबंधन भारतीय राजनीति में मजबूरी बनने वाला है या फिर ऐसा विकल्प जिसमें हर क्षेत्र के विकास का रास्ता खुले लेकिन दबाव न हो? भाजपा अपनी जीत को लेकर आश्वस्त है और विपक्ष की ओर से भाजपा की हार का दावा ठोका जा रहा है। ऐसे में भाजपा के शीर्ष नेता व केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ऐसी बहस का सीधा जवाब देते हैं, ‘देश में माहौल मोदी के पक्ष में है। जनता नेतृत्व को देख रही है और विपक्ष में न तो चेहरा है और न ही नीयत।’

दैनिक जागरण के वरिष्ठ कार्यकारी संपादक प्रशांत मिश्र और राष्ट्रीय ब्यूरो प्रमुख आशुतोष झा से बातचीत में वह साफ साफ कहते हैं, ‘यह सबल नेतृत्व और अराजकता के बीच का चुनाव है और हम बहुमत से आएंगे।’ प्रस्तुत है उनके साथ हुई बातचीत के प्रमुख अंश :

मोदी सरकार की छवि रही है कि चुनाव के दबाव में भी लोकलुभावन फैसले नहीं लेती है। लेकिन इस बार टैक्स में छूट देना, पीएम किसान योजना जैसे कई फैसले क्या दर्शाते है?
यह गलत सोच है। टैक्स में छूट को सस्ती लोकलुभावन राजनीति नहीं मानना चाहिए। मैंने 2014 के चुनाव में ही पांच लाख तक आयकर की छूट दिए जाने की बात कही थी और इसके बाद सोशल मीडिया पर मेरे खिलाफ कैंपेन भी चला था कि कब करोगे। यह एक साल में तो नहीं किया जा सकता है क्योंकि उसमें राजस्व की इतनी हानि होगी कि देश चलाना मुश्किल हो जाएगा। लेकिन हम शुरू से धीरे-धीरे इस दिशा में बढ़ते रहे। देश की ताकत पहचानिए। इस देश का मध्यम वर्ग और नया मध्यम वर्ग सबसे तेज गति से बढ़ रहा है।

गांव से युवा शहर की ओर आ रहे हैं। हर शहर के बाहर आवासीय विकास हो रहा है। मैं मानता हूं कि आने वाले दो दशकों में भारत का मध्यम वर्ग और उसका परचेजिंग पावर (क्रय शक्ति) विश्व में सबसे अधिक होगा। उस परिस्थिति में मध्यम वर्ग को ध्यान में रखते हुए पांच लाख रुपये तक की छूट की घोषणा की गई है।

पहले साल में हमने दो से ढाई लाख किया, उसके बाद पचास हजार की छूट और बढ़ाई गई। फिर मैंने तीन से पांच लाख के बीच दस फीसद को पांच फीसद किया, और अब पांच लाख तक आय को मुक्त करने की बात कही गई है। इसका यह अर्थ है कि आठ नौ लाख कमाने वाला व्यक्ति नगण्य या फिर कर से पूरी तरह मुक्त हो सकता है। वह अपने बच्चों को अच्छी जगह पढ़ा सकता है, घर खरीद सकता है। सरकार की सोच है कि उसकी परचेजिंग पावर बढ़ाई जाए ताकि उसकी भी सेहत सुधरे और देश की भी। यह सकारात्मक दीर्घकालिक सोच का नतीजा था, कोई लोकलुभवन फैसला नहीं।

किसान योजना भी तो आखिरी साल में शुरू हुई। और फिर पैसे बढ़ाने की भी बात हो रही है?
देखिए, ऋण माफी का ढिंढोरा पीटा जा रहा है लेकिन यह किसानों की समस्या खत्म करने के लिए नहीं है। दुनिया भर में विशेषज्ञ मानते हैं कि हमें किसानों को मदद देकर उन्हें खड़ा करना चाहिए। हम फसल बीमा दे रहे हैं, खाद सस्ती दे रहे हैं, बीज सस्ती दे रहे हैं और उसके ऊपर साल में छह हजार रुपये की मदद दे रहे  हैं। सुविधा के आधार पर भी गांव के जीवन को शहर के नजदीक लाया जा सके, इसके लिए काम किया जा रहा है। यह सामाजिक और आर्थिक जरूरत है, सस्ती लोकप्रियता नहीं।

जहां तक पैसे बढ़ाने की बात है तो मैंने कहा था कि जब देश की आर्थिक शक्ति बढ़ेगी तो उस पर भी काम होगा। लेकिन राहुल जी जो इसकी आलोचना कर रहे हैं वह कम से कम कांग्रेस शासित राज्यों को तो कहें कि कुछ रुपये अपनी तरफ से जोड़कर किसानों को मदद पहुंचाएं। मैं तो सभी राज्यों से अपील करता हूं कि जब केंद्र से आपको ज्यादा पैसा दिया जा रहा है तो कुछ आप भी खर्च करो। छह हजार रुपये केंद्र दे रहा है, छह हजार आप भी जोड़ दो। कुछ राज्यों ने जोड़े हैं। कांग्रेस केवल ऋण माफी की घोषणा करती है लेकिन मदद नहीं कर रही है।

आपकी बातों से तो लगता है कि भाजपा जीत को लेकर शुरू से आश्वस्त थी। फिर सहयोगी दलों को लेकर रुख में इतना बदलाव कैसे आ गया? पार्टी इनके आगे झुकती हुई नजर आई?
राजनीति में अपनी सीटें बचाने और बढ़ाने की चाह लाजिमी है। इसलिए उस इच्छा का कोई शिकार हो जाए तो मैं उसे दोष नहीं दूंगा। हमारा ध्यान परिणाम पर है और हम जानते हैं कि हमारे सभी साथी शुरू से हमारे साथ थे और रहेंगे।

क्या चुनाव के बाद टीआरएस (तेलंगाना राष्ट्र समिति), वाईएसआर कांग्रेस जैसे दल भी साथ जुड़ सकते हैं?
हम अपनी ताकत से बहुमत पाएंगे।  

विपक्ष को भाजपा मिलावट वाला गठबंधन करार दे रही है, लेकिन यह तो सच है कि आपातकाल के बाद पहली बार पूरा विपक्ष इकट्ठा हुआ है। क्या भाजपा के लिए सतर्क होने की घड़ी नहीं है?
विपक्ष के एकजुट होने से ही सरकार खतरे में आ जाती है, ऐसा नहीं है। आपातकाल से पहले 1971 में भी हम इकट्ठे हुए थे और बुरी तरह हार गए थे। 1977 में हम जीत गए, इंदिरा जी हार गईं, लेकिन इसका कारण गठबंधन नहीं एंटी इमरजेंसी माहौल था। और इस बार भी तथाकथित महागठबंधन हारेगा, क्योंकि देश में प्रो भाजपा, प्रो मोदी माहौल है।

यानी एकजुट विपक्ष के लिए आपको कोई विशेष तैयारी करने की जरूरत नहीं है?
मैंने आपको उदाहरण तो दे दिया, यह 1977 वाला नहीं 1971 वाला चुनाव है। केवल एकजुटता से काम नहीं होता, और यहां तो एकजुटता भी नहीं है, हर दल अपनी राह चल रहा है। हर दल खुद के लिए भविष्य देख रहा है। इस एकजुटता में मंशा से लेकर लक्ष्य तक अलग-अलग हैं। 1971 में हमें लगा था कि इंदिरा जी हार जाएंगी, लेकिन वह सवा तीन सौ सीटें ले गईं।

आप अक्सर प्रेसीडेंशियल फार्म ऑफ इलेक्शन की बात करते रहे हैं। क्या इस बार ऐसा लगता है कि दो चेहरे सामने हैं?
नेतृत्व की परीक्षा हो सकती है। हमें कोई आपत्ति नहीं है। वह चाहें तो मोदी बनाम राहुल कर लें, मोदी बनाम मायावती कर लें, मोदी बनाम ममता कर लें। उनमें हिम्मत कहां है।

लेकिन राहुल गांधी तो बार-बार चुनौती दे रहे हैं। कह रहे हैं कि दस मिनट की चर्चा में परास्त कर देंगे?
लेकिन क्या विपक्ष एक स्वर से राहुल का नाम ले रहा है। पहले वह विपक्ष के अंदर नेतृत्व को लेकर छिड़ी लड़ाई तो जीत कर आएं। ममता, मायावती से स्वीकृति तो लेकर आएं। कोई कहे तो सही कि राहुल हमारे नेता हैं फिर वह चर्चा की बात करें।

तीन दशक बाद कोई एक दल पूर्ण बहुमत लेकर आया था। क्या आपको लगता है कि यह इस बार भी संभव है?मुझे विश्वास है कि हम फिर से बहुमत लेकर आएंगे, और सरकार राजग की ही बनेगी।

भाजपा में यह सवाल बार-बार उठता रहा है कि 75 प्लस के नेताओं का क्या होगा। क्या वह चुनाव लड़ पाएंगे?
इस पर संसदीय बोर्ड निर्णय लेगा।
 

Posted By: Dhyanendra Journal

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