महासमुंद। जनप्रतिनिधि बनने का जुनून किस कदर सवार होता है, इसका नमूना नामांकन दाखिले के दौरान देखने को मिला। सिहावा विधानसभा क्षेत्र निवासी 42 वर्षीय युवक झनकलाल चंद्रवंशी लघु सीमांत किसान हैं। उनकी आर्थिक स्थिति बहुत ज्यादा सुदृढ़ नहीं है। फिर भी चुनाव लड़ने का जुनून सवार हुआ। 25 मार्च को अपने गृहग्राम सिरौदकला, धमतरी से महासमुंद पहुंचे और नामांकन प्रक्रिया की पूरी जानकारी ली। फार्म भी ले लिया।

दूसरे दिन 26 मार्च को नामांकन दाखिले के आखिरी दिन फिर पहुंचे। वे अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए निर्धारित शुल्क साढ़े बारह हजार रुपये लेकर आए थे। जाति प्रमाण पत्र लाना भूल गए। अपने प्रमाण पत्र के स्थान पर बेटे का प्रमाण पत्र उठा लाए। अंतत: बिना नामांकन दाखिल किए ही बैरंग लौटना पड़ा।

महासमुंद से चुनाव लड़ने के लिए करूंगा पांच साल इंतजार

ये हैं 33 वर्षीय प्रधानी बाग। ओडिशा के कालाहांडी जिला के लाडूगांव के निवासी हैं। महासमुंद लोकसभा हाईप्रोफाइल सीट है, यह सुना था। गत 2014 में हुए चुनाव में एक ही नाम के 11 चंदूलाल के यहां चुनाव लड़ने से इस कदर प्रभावित हुए कि महासमुंद सीट से चुनाव लड़ने का ठान लिया। वे वर्तमान में सेंट्रल यूनिवर्सिटी गांधीनगर गुजरात से पीएचडी कर रहे हैं। राजनीति से समाज सेवा का सपना संजोए सैकड़ों किमी दूर ओडिशा से नामांकन दाखिल करने आए थे। अंतिम दिन और अंतिम समय में नामांकन दाखिल करने पहुंचे।

दरअसल, वेबसाइट से वे नामांकन फार्म निकालकर और पूरी जानकारी तैयार करके पहुंचे थे। जो फार्म वे भरकर लाए थे, वह पुराना फार्मेट था। नामांकन दाखिले के पहले चुनाव खर्च का ब्योरा देने अलग से बैंक खाता खोलना आवश्यक होता है। वह भी तैयारी नहीं थी। पुराना बैंक खाता का विवरण लेकर पहुंचे थे। इस तरह औपचारिकता पूरी नहीं कर पाने से चुनाव लड़ने का सपना अधूरा रह गया। प्रधानी का का कहना है कि वे अगले पांच साल इंतजार करेंगे, लेकिन लड़ेंगे तो महासमुंद संसदीय सीट से ही। वे ओडिशा के धमरगढ़ विधानसभा क्षेत्र के निवासी हैं। 

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