रविशंकर। लोकसभा चुनाव आते ही किसान एक बार फिर सुर्खियों में है। राजनीतिक दलों ने किसानों को लेकर राजनीति शुरू कर दी है। सियासी दल बखूबी जानते हैं कि 2019 फतह करने के लिए किसानों का साथ कितना जरूरी है। उन्हें मालूम है कि किसान की उपेक्षा कर सत्ता के सिंहासन तक नहीं पहुंचा जा सकता।

इसलिए कोई भी पार्टी किसानों का साथ नहीं छोड़ना चाहती है। यही वजह है कि चुनाव आते ही कमोबेश सभी राजनीतिक दल किसानों को साधने में जुटे हैं। कांग्रेस हो या भाजपा या फिर दूसरा अन्य राजनीतिक दल, सभी की सभाओं और रैलियों में किसानों से जुड़े मुद्दे प्रमुखता से छाए हुए हैं। हर पार्टी किसानों पर अपना दावा जता रही है।

आंकड़े बताते हैं कि देश में करीब नौ करोड़ किसान परिवार हैं, यानी करीब 45 करोड़ लोग। किसानों के मसले पर सरकार और विपक्ष आमने-सामने है। विपक्ष यह साबित करने में लगा है कि भाजपा सरकार किसान विरोधी है और वह किसानों के हित में काम नहीं कर रही है। वहीं भाजपा का कहना है कि बीते पांच वर्षो में किसानों के लिए पीएम मोदी ने जितना काम किया है उतना काम बीते छह दशकों में कांग्रेस की सरकारों ने नहीं किया।

कमोबेश हर राजनेता और राजनीतिक दल का यही चरित्र होता है। विपक्ष में रहते हुए सारे दलों के नेता ऊंची आवाज में किसानों के पक्ष में बोलते नहीं थकते हैं। चुनाव से पूर्व किसानों के हित और उनकी आर्थिक तरक्की की दुहाई भी हर नेता देते हैं, लेकिन व्यावहारिकता के धरातल पर कोई काम नहीं होता। यही वजह है कि आज भी हमारे किसान हाशिये पर जीने के लिए मजबूर हैं।

वर्ष 2016 के आर्थिक सर्वे के मुताबिक, भारत के 17 राज्यों में खेतिहर परिवारों की औसत आमदनी सालाना 20 हजार रुपये से भी कम है। नीति आयोग ने बताया कि वर्ष 2010 से 2015 के बीच देश भर में किसानों की वास्तविक आय में वार्षिक वृद्धि दर आधा प्रतिशत से कम रही और अगर मुद्रास्फीति से समायोजित करें, तो पिछले चार दशकों में किसानों की आय स्थिर रही है।

जाहिर है कि देश में कृषि के क्षेत्र का संकट भीषण है। इनमें मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य शामिल हैं, जहां ग्रामीण मतदाताओं की हिस्सेदारी ज्यादा है। ऐसा क्यों है कि जब चुनाव आते हैं तब सभी राजनीतिक दल किसानों से उनकी सभी मांगें पूरी करने का वायदा करते हैं, पर चुनाव खत्म होते ही किसानों को भुला दिया जाता है।

पुरानी कहावत है कि भारतीय किसान कर्ज में जन्म लेता है, कर्ज में ही पूरा जीवन रहता है और कर्ज में मर जाता है। यह आज भी सही है। एक रिपोर्ट के मुताबिक घाटे का सौदा होने की वजह से देश भर में हर रोज ढाई हजार किसान खेती छोड़ रहे हैं। विडंबना यह कि देश में किसानों की कोई एक परिभाषा भी नहीं है। वित्तीय योजनाओं में, राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो और पुलिस की नजर में किसान की अलग-अलग परिभाषाएं हैं। यह उस देश के लिए दुर्भाग्य की बात है जहां करीब 60 प्रतिशत आबादी खेती-किसानी से गुजारा करते हैं। कृषि में सुधार के बिना न तो देश की हालत में सुधार संभव है और न ही किसानों की स्थिति सुधर सकती।

आजादी के बाद विकास की अधिकांश योजनाएं शहरों को केंद्र में रखकर बनाई गईं और किसान तथा कृषि प्रधान देश का नारा संसद तक सीमित रहा। लेकिन मिशन 2019 से पहले किसान राजनीति अहम मोड़ पर आ गई है और सियासत के केंद्र में रहने वाले किसानों को साधने के लिए मैदान में आ गए हैं। किसानों को साथ लिए बिना किसी भी पार्टी के लिए सत्ता की डगर बहुत ही कठिन है।

किसानों की समस्या का एक ही समाधान है। कृषि लागत पर नियंत्रण और उपज की वाजिब कीमतें सुनिश्चित करना। आज भी खाद्य पदार्थो की महंगाई को काबू में रखने के लिए किसानों को वाजिब कीमत नहीं दी जा रही है। सरकारों का किसानों के प्रति रवैया देखते हुए यह नहीं समझा जा सकता है कि किसान कृषि उपज से मुनाफा हासिल करने के लिए खेती करता है या घाटा पैदा करने वाली खेती करता है।

उद्योग और व्यापार जगत की चहलकदमी से अर्थव्यवस्था में सुधार देखने को मिल रहा है और इस बीच कृषि क्षेत्र की लगातार उपेक्षा होती जा रही है। किसानों की चिंताएं दूर करने के लिए प्रयास करने होंगे। देश की जनसंख्या का एक बड़ा भाग कृषि पर आश्रित है। कृषि क्षेत्र की अनदेखी कर विकास को स्थायित्व प्रदान करने की कल्पना नहीं की जा सकती। केंद्र सरकार ने 2022 तक देश के किसानों की आय को दोगुना करने का लक्ष्य रखा है।

इस लक्ष्य को ठोस कार्य योजना से ही प्राप्त किया जा सकता है। सरकार को कृषि क्षेत्र की मजबूती के लिए संवेदनशीलता के साथ कार्य करना चाहिए। विकास दर में उछाल बरकरार रखने के लिए विकास के सभी क्षेत्रों की ओर समान ध्यान देने की जरूरत है। किसान को लेकर राजनीति तो होती रही, लेकिन दुर्भाग्य कि उसको लेकर कोई कारगर नीति अभी तक नहीं बनी है।

  स्वतंत्र टिप्पणीकार

Posted By: Dhyanendra Singh