नई दिल्ली, शिवांग माथुर। लोकसभा चुनाव में किस्मत आजमाने जा रहे नेताओं के साथ ही इस बार इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) भी अग्निपरीक्षा देने जा रही है। लंबे समय से विवादों में फंसी ईवीएम कई मौकों पर खुद को भले ही सही साबित करती रही हो, लेकिन इसके बाद भी तमाम राजनीतिक दलों की शक भरी निगाहों से इसे गुजरना पड़ा है।

नतीजे चाहे किसी के भी पक्ष में रहे हों, लेकिन समय-समय पर ईवीएम को विवादों में घसीटा गया है। लगातार हार का सामना कर रहे दलों ने तो ईवीएम में छेड़छाड़ और हैकिंग तक के आरोप लगाकर चुनाव आयोग को सवालों के कठघरे में खड़ा किया है। ऐसा नहीं है कि देश में ईवीएम का प्रयोग कोई नई बात है, लेकिन पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश के कैराना और महाराष्ट्र के भंडारा-गोंदिया में हुए लोकसभा उपचुनाव में जिस स्तर पर ईवीएम मशीनें खराब हुईं, उसने सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा। उस वक्त आयोग ने भी सिर्फ यह कहते हुए पल्ला झाड़ लिया था कि मशीनें तेज गर्मी के चलते खराब हुई हैं।

वहीं चुनाव आयोग हमेशा से ही इस बात पर कायम रहा है कि मशीन में छेड़छाड़ संभव नहीं है। इसमे कोई शक नहीं कि ईवीएम ने सामाजिक, राजनीतिक और आबादी के लिहाज से अत्यंत जटिल ताने-बाने वाले भारत में चुनाव प्रक्रिया को काफी सहज और सटीक बनाया है। बूथ कैप्चरिंग, फर्जी मतदान, अवैध वोट, हिंसा आदि पर अंकुश लगा है। लेकिन साथ ही इस बात को भी नहीं भुलाया जा सकता कि बसपा प्रमुख ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में मिली करारी हार के बाद ईवीएम को जिम्मेदार ठहराया था।

वहीं, इससे पहले 2009 में भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने भी ईवीएम को लेकर संदेह जताया था और परम्परागत मतपत्रों की वापसी की मांग की थी। बाद में भाजपा प्रवक्ता बने पूर्व चुनाव विश्लेषक जीवीएल नरसिम्हाराव ने उस दौरान एक किताब भी लिखी थी, जो ईवीएम से जुड़ी आशंकाओं पर ही केंद्रित थी। पिछले दिनों कांग्रेस से लेकर बसपा और अन्य दलों ने इसे निशाना बनाया है। हाल तो यह है कि जब कांग्रेस ने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में जीत हासिल की थी, तब भी मुक्तकंठ से ईवीएम की प्रशंसा नहीं की थी। जाहिर है कि ईवीएम को अभी अग्निपरीक्षा से गुजरना ही होगा।

 

Posted By: Dhyanendra Singh

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