नई दिल्ली, शिवांग माथुर। चुनावी बिगुल के साथ ही राजनीतिक दलों द्वारा घोषणाओं और विजन डाक्युमेंट में लोकलुभावन दावों और वादों के बल पर एक-दूसरे को पछाड़ने का दौर शुरू हो गया है। ऐसे में फिर से यह सवाल लाजिमी हो गया है कि घोषणापत्र की विश्वसनीयता और धरातल पर उसका क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिए चुनाव आयोग क्या कुछ करेगा?

सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में ही इस तरह के मामलों में हथौड़ा चलाया था। कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा था कि वह चुनाव से पहले राजनीतिक दलों की ओर से जारी किए जाने वाले घोषणा पत्रों के बारे में दिशा निर्देश तैयार करे। कोर्ट ने विधायिका को इस बारे में अलग से कानून बनाने तक के लिए कहा था, ताकि लोकतांत्रिक समाज में राजनीतिक दलों पर अंकुश लगाया जा सके। कोर्ट ने यह फैसला तमिलनाडु की जयललिता सरकार के मुफ्त उपहार बांटने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा था - ‘चुनावी घोषणा पत्र में वादे करना मौजूदा कानून के मुताबिक गलत नहीं है, लेकिन इस सच्चाई से इन्कार नहीं किया जा सकता कि चुनावी वादे करमुफ्त उपहार बांटने का लोगों पर असर पड़ता है। इससे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की नींव हिल जाती है।’ इसी को देखते हुए आयोग ने नियम बनाया था, जिसमें राजनीतिक दलों को घोषणापत्र की तीन प्रतियां आयोग को देने की बात तय हुई थी। ताकि इन चुनावी वादों का रिकॉर्ड रखा जा सके और घोषणा पत्रों का परीक्षण किया जा सके।

राष्ट्रीय पार्टियां हों या क्षेत्रीय दल सभी सुर्खियों में बने रहने के लिए चुनावी घोषणा पत्र में लोकलुभावने करते हैं। लेकिन इनमें कई ऐसे वादे होते हैं जिनके पूरे होने पर संशय होता है। यह अपेक्षा की गई थी कि चुनावी घोषणा पत्रों में किए गए दावों और वादों को हकीकत में पूरा करने के लिए संसाधन जुटाने का खाका और पर्याप्त योजना दिये बगैर वे केवल मतदाताओं को गुमराह न कर पाएं।

इसके तकनीकी, कानूनी पहलू व आदर्श चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन पर चुनाव आयोग का दृष्टिकोण काफी महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके बाद भी यह अब तक नाकाफी ही साबित होता आया है। चुनावी घोषणा पत्र में वादे कर मुफ्त सामान और सपने बांटने की परंपरा की बात भी कोई नई नहीं है, पर इस मामले में भी आयोग के पास नियमावली की किताब के अलावा कार्रवाई के तौर पर ठोस कुछ भी नहीं है। चुनाव आयोग के अनुसार, उसने इसकी निगरानी शुरू कर दी है। ऐसे में यह उम्मीद की जानी चाहिए कि इस बार दल अतीत की तरह किए गए आसमानी वादों से बचेंगे।  

Posted By: Dhyanendra Singh