प्रो. जगदीप छोकर। चुनावी बुखार से तप रहे देश में आदर्श आचार संहिता के मामले बड़ी संख्या में सामने आ रहे हैं। चुनावों में पैसे का खेल और इन उल्लंघनों की कहानी एक दूसरे से गुंथी हुई है। दरअसल पार्टियों और प्रत्याशियों के पास बेहिसाब पैसा इस चुनावी वैतरणी को पार करने का आसान साध्य माना जाता है। जिसके चलते आचार संहिता को ठेंगे पर रखे जाने से भी परहेज नहीं किया जाता है। तमिलनाडु की वेल्लोर लोकसभा का चुनाव स्थगित होने सहित ऐसी कई घटनाओं के मूल में पैसा ही रहा है। चुनाव का थिरुमंगलम मॉडल कौन भूल सकता है, जिसमें मतदाताओं को बांटने के लिए एंबुलेंस में रुपये भरकर ले जाते लोग पकड़े गए थे।

चुनावों में खर्चे का मुद्दा पिछले दो दशक से चर्चा में हैं। इस पर कई समितियों और आयोगों ने बहुत कुछ लिखा है और अनगिनत सुझाव दिये है लेकिन नतीजा सिफर रहा। कारण बहुत ही साधारण हैं। सारे के सारे राजनीतिक दल इस के बारे में कहते तो बहुत कुछ है, लेकिन वास्तव में करना कुछ नहीं चाहते। राजनीतिक दलों के इसके बारे में कुछ ना करने का भी कारण है। यह कारण भारतीय विधि आयोग ने 1999 में अपनी 170वीं रिपोर्ट में लिख दिया था। उस रिपोर्ट के अनुच्छेद 6.3.1 में लिखा गया है, ‘सार्वजानिक जीवन के हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा है।

लोगों के राजनीति में आने और चुनाव लड़ने का प्रमुख कारण है उनकी रातों-रात अमीर बनने की इच्छा।’ वर्तमान सरकार ने 2017 के बजट में चुनावी बांड नामक नयी योजना की घोषणा की। इस योजना के अंतर्गत कोई भी व्यक्ति या कंपनी स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की निर्धारित शाखाओं से एक हजार, दस हजार, एक लाख, दस लाख, या एक करोड़ के चुनावी बांड खरीदकर अपनी पसंद के किसी भी राजनीतिक दल (जिसको पिछले चुनाव में एक प्रतिशत से अधिक मत प्राप्त हुए हों) को दे सकता है।

योजना की घोषणा के अंतर्गत खास बात ये है कि यह बांड पूरी तरह से गुमनाम होगा। इस पर खरीदने वाले का नाम नहीं होगा। खरीदने वाले की पहचान केवल स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को होगी और योजना में लिखा है कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया इस पहचान के बारे में किसी को नहीं बताएगा जब तक आपराधिक मामले में अदालत के आदेश ना हों। इस तरह देखने से तो ये योजना काफी आकर्षक लगती है लेकिन जब इसके प्रावधानों को बारीकी से और विस्तारपूर्वक देखा जाय तो पता लगता है इसमें काफी आश्चर्यजनक और चिंताजनक बातें हैं। उदाहरण के लिए कंपनियों के कानून में दो प्रावधान थे।

एक तो ये कि केवल वही कंपनी चंदा दे सकती थी जिसने पिछले तीन सालों में लाभ कमाया हो, और वो भी अपने पूरे लाभ का केवल 7.5 प्रतिशत हिस्सा। दूसरा प्रावधान ये था कि अगर कोई कंपनी किसी राजनीतिक दल को चंदा देती है तो उसको राजनीतिक दल का नाम और चंदे की राशि बताना अनिवार्य था। चुनावी बांड योजना के अंतर्गत ये दोनों प्रावधान हटा दिए गए हैं। इसका असर ये होगा कि अब कोई भी कंपनी, चाहे वह नुकसान में ही क्यों न हो, जितना मर्जी पैसा किसी भी राजनीतिक दल को दे सकती है, और किसी को ये पता नहीं चलेगा कि किस कंपनी ने किस दल को कितना पैसा दिया।

इन नए प्रावधानों को लागू करने से, और पुराने प्रावधानों को हटाने से राजनीतिक और चुनावी चंदे में पारदर्शिता कैसे बढती है, यह समझना एक सामान्य नागरिक के लिए तो अत्यंत मुश्किल लगता है। इस चुनावी बांड योजना का एक और पहलू चिंताजनक है। वह यह है कि बांड खरीदने वाले की पूरी जानकारी केवल, और सिर्फ केवल, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के पास होगी। बांड खरीदने वाले की और देने वाले की जानकारी उस राजनीतिक दल को भी हो सकती है, जिस दल तो वो बांड दिया जाय, पर यह जरूरी नहीं है कि राजनीतिक दल को ये पता चले। बल्कि योजना के प्रावधानों के अंतर्गत तो राजनीतिक दल को ये पता चलना ही नहीं चाहिए कि उसको ये बांड किसने दिया है।

इस बात पर बहुत सहजता से विश्वास नहीं किया जा सकता कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया खरीदने वाले की जानकारी, बिना अदालत के आदेश के, किसी को भी नहीं देगा। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया सरकार का बैंक है। ऐसे में यह मानना असंभव है कि वित्त मंत्रालय स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से कोई जानकारी मांगे और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया जानकारी देने से मना कर दे। और अगर वित्त मंत्रालय को पता चल जाये कि किसने कितने के चुनावी बांड खरीदे हैं, तो सत्तारूढ़ दल बांड खरीदने वाले पर किसी भी तरीके का दबाव डाल सकता है।

 पहले तो यह केवल डर ही था कि चुनावी बांड योजना के कारण विपक्षी दलों को चंदा मिलना बंद हो सकता है लेकिन जब 2017-18 के आंकड़े सार्वजनिक हुए तो पता चला कि उस साल में कुल 220 करोड़ रूपये के चुनावी बांड बिके और 210 करोड़ (95 फीसद) के बांड सत्ताधारी दल भाजपा के बैंक खाते में जमा हुए। इससे साबित हो गया कि चुनावी बांड योजना से सत्तारूढ़ दल की मलाई है, विपक्षी दलों को चंदे के सूखे से जूझना पड़ सकता है। ऐसी योजना से चुनावी चंदे में क्या पारदर्शिता आएगी इसका अनुमान लगाना कठिन काम नहीं है।

सब एक थाली के चट्टे-बट्टे: 

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की पिछली सरकार ने भी कहा था कि वह राजनीतिक चंदा देने में कंपनी और राजनीतिक दल में सीधा संबंध समाप्त करने की इलेक्टोरल ट्रस्ट योजना लाएगी। इसी योजना के अंतर्गत कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी, दोनों ने एक इलेक्टोरल ट्रस्ट से करोड़ों रुपये का चंदा लिया। थोड़ी सी ही जांच पड़ताल से पता चला कि वह ट्रस्ट एक विदेशी कंपनी के संपूर्ण नियंत्रण में था।

इन तथ्यों को देखकर दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2014 में फैसला दिया कि कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी, दोनों ने विदेशी मुद्रा कानून का उल्लंघन किया है। उसने भारत सरकार को इन दोनों दलों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करने का आदेश दिया। कार्रवाई करने की जगह सरकार ने विदेशी मुद्रा कानून में संशोधन करने का प्रयास किया। जब पहला प्रयास सफल नहीं हुआ तो एक ऐसे कानून में संशोधन किया गया जो आठ साल पहले रद्द कर दिया गया था। ऐसा करना सरासर गैर-कानूनी है और इसीलिए यह मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।

समस्या का समाधान

राजनीतिक दल चुनावी चंदे के मामले को कभी ठीक नहीं करेंगे। यह तभी ठीक हो सकता है जब राजनीतिक दल सूचना के अधिकार कानून के दायरे में आएंगे। इस पर केंद्रीय सूचना आयोग तो अपना निर्णय तीन जून, 2013 को दे चुका है जिसको मानने से राजनीतिक दलों ने खुलेआम मना कर दिया है और ये मामला भी अब सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। जब इस कानून के दायरे में आएंगे तभी सभी जानकारी मिल सकेगी।

 (संस्थापक सदस्य, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉम्स)

Posted By: Dhyanendra Singh