नई दिल्ली, शिवांग माथुर। लोकतंत्र के महापर्व के मंथन से निकले अमृत ने चुनाव आयोग की साख पर महीनों से लग रहे बट्टे को आखिर धो ही दिया। महीनों की कड़ी मेहनत और मशक्कत से देश भर में कराए गए चुनाव और उसके नतीजों के बाद शायद अब चुनाव आयोग पर आरोपों का दौर खत्म हो जाए। चुनाव आयोग को उम्मीद है कि अलग अलग कारणों से आयोग और उसकी साख पर छाये संकट के बादल अब छंट जाएंगे। इस चुनाव में सबसे बड़ा संकट इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीनों यानी ईवीएम की विश्र्वसनीयता बहाल करने का रहा। चरण दर चरण आयोग खुद पर लग रहे गंभीर आरोपों से जूझता रहा। चुनाव शुरु होने से पहले ही विपक्ष ने ईवीएम को सवालों के कठघरे में खडा कर दिया। वहीं ईवीएम के अलावा आयोग के अधिकारों को लेकर भी सवाल खड़े हुए। चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन हो या भड़काऊ भाषणों का इस्तेमाल होना और धनबल के इस्तेमाल को रोकने में भी आयोग की भूमिका संदेह के घेरे में रही। यहां तक की चुनाव का अंत आते-आते आयोग के आपसी मतभेद भी जग जाहिर हो गए। लेकिन इस सबके बावजूद नतीजों के बहाव ने आरोपों के तूफान को थाम लिया।

चुनाव आयोग ने तो ईवीएम पर से संदेह खत्म करने के लिए एक साल पहले ही चुनौती दी थी। लेकिन आयोग विपक्ष की नजर में ईवीएम को पाक साफ साबित नहीं कर पाया और न ही कोई दूसरा व्यक्ति या राजनीतिक दल इसमें गड़बड़ी साबित कर पाए। बावजूद इसके आयोग ने सभी के सवालों का जवाब दिया और आरोपों को तर्क पूर्वक खारिज भी किया। असल में यह सारा विवाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट, महाराष्ट्र की पालघर और भंडारा गोंदिया लोकसभा सीट के उपचुनाव से शुरु हुआ। जिसमें ईवीएम और वीवीपैट की 150 मशीनें खराब हो गई। बस यहीं एक मौका था, जब बिखरे हुए विपक्ष को अपनी हार और बौखलाहट का ठीकरा ईवीएम पर फोड़ने का मौका मिल गया।

भाजपा की सहयोगी शिवसेना ने तो यहां तक आरोप लगा दिया कि जैसे पहले बूथ कैप्चरिंग और बोगस वोटिंग होती थी उसी तरह अब कुछ लोग रिमोट लेकर ईवीएम कंट्रोल करने के लिए बैठे हैं। कांग्रेस ने इसको और बल देते हुए सैय्यद शुजा नाम के हैकर को खोज निकाला जिसके दावे भी खोखले साबित हुए। चुनाव आयोग की साख पर एक सवाल इस बात को लेकर भी खड़ा हुआ कि वह राजनीतिक पार्टियों को अपनी मनमानी करने से नहीं रोक पाया। चुनाव आयोग हर उम्मीदवार के लिए खर्च करने की सीमा और पार्टी के खर्चे पर भी बहुत हद तक रोक नहीं लगा पाया।

बात कुछ राजनीतिक दलों या नेताओं द्वारा चुनाव आयोग की ईमानदारी और निष्पक्षता पर सवाल उठाने तक ही सीमित रहती तो मामला अलग होता किन्तु जिस प्रकार चुनावी प्रक्रिया के अंतिम चरण से ठीक पहले तीन चुनाव आयुक्तों में से एक अशोक लवासा ने ही चुनाव आयोग को कटघरे में ला खड़ा किया, उससे चुनाव आयोग की निष्पक्ष छवि को गहरा आघात लगा।

चुनावी प्रक्रिया के दौरान जब कुछ राजनीतिक दलों ने आयोग की भूमिका को लेकर शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया, तो अदालत द्वारा आयोग को फटकार लगाई गई। तब आयोग द्वारा स्वयं के 'अधिकारहीन' और 'शक्तिहीन' होने का तर्क दिया गया और सर्वोच्च अदालत द्वारा आयोग को उसकी शक्तियों और अधिकारों का स्मरण कराया गया।

इसमें कोई दोराय नहीं कि पिछले दो दशक में देश की जिन चंद संवैधानिक संस्थाओं की सर्वोच्च विश्र्वसनीयता बनी उनमें एक संस्था चुनाव आयोग है। टीएन शेषन के मुख्य चुनाव आयुक्त रहने के बाद धीरे धीरे इस संस्था की जबरदस्त विश्र्वसनीयता बनी। यह संस्था स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की गारंटी बन गई। लेकिन मौजूदा स्थिति में इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि आयोग को फिर से अपनी छवि को देश की नजरों में पुन: स्थापित करना होगा, ताकि लोकतंत्र के प्रति आस्था में गिरावट न आए। चुनावी प्रक्रिया के इस बेहद लंबे दौर में जिस प्रकार पहली बार चुनाव आयोग की भूमिका पर शुरू से लेकर आखिर तक उंगलियां उठती रही, वह देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की सेहत के लिए हरगिज सही नहीं है।

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Posted By: Nitin Arora

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