पटना [अमित आलोक]। बिहार में लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Election) के पहले चरण में चार लोकसभा सीटों पर गुरुवार को मतदान (Phase 1 Voting) हुआ। इसमें वोटरों की बड़ी तादाद अपने असली मुद्दों को लेकर गंभीर दिखी। खासकर युवा व शिक्षित वोटर जातिवाद को बाय-बाय करते दिखे।
युवाओं ने दिखाई बदलाव की राह
बिहार में जाति की राजनीति की पुरानी परंपरा रही है। लेकिन इस बार के चुनाव में स्थिति में कुछ बदलाव नजर आया। खासकर शिक्षित व युवा वोटरों में जातियों के चक्रव्यूह से निकलकर विकास के मुद्दे पर वोट करने की ललक देखी गई।
गया में पहली बार मतदान करने वाली मुन्नी तथा नेहा ने बताया कि उन्‍हाेंने विकास के लिए वोट दिया। गया के ही पहली बार वोट देने वाले संजय मानते हैं कि जातिवाद का जहर निकाले बिना विकास नहीं हो सकता और विकास किए बिना जनता का भला नहीं होने वाला। औरंगाबाद में पहली बार मतदान करने वाली पूजा शर्मा ने भी कहा कि वोट तो विकास के नाम पर ही दी। जमुई के रंजन यादव हों या नवादा की संजना सिंह, सभी जगह युवाओं में विकास के नाम पर वोटिंग का क्रेज दिखा। युवा वोटर पूरे उत्साह में अपने इलाके की बात कर रहे थे। जो उनके लिए कुछ करेगा वोट उसी का, यह युवा वोटरों की जुबान पर था।
समाजिक मुद्दा भी बना विकास
ऐसा नहीं कि विकास केवल युवाओं का ही मुद्दा था। कई जगह यह पूरे समाज का मुद्दा बनता दिखा। विकास नहीं होने से खफा लोगों ने कई जगह वोट का सामूहिक बहिष्‍कार तक कर दिया।
जमुई संसदीय क्षेत्र के शेखपुरा विधान सभा के बूथ नंबर 95 ओठमा गांव में लोगों ने सड़क और पानी की समस्याओं को लेकर वोट बहिष्कार किया। जमुई के तरी दाबिल बूथ संख्या 232 पर भी लगभग 1300 मतदाताओं ने वोट का बहिष्कार किया। जमुई के सिकंदरा में बूथ 129 व 130, चकाई में बूथ 257 तथा खैरा में बूथ 232 पर वोट का बहिष्‍कार किया गया।
नवादा के वारिसलीगंज विधानसभा के बरडीहा बलियारी बूथ सहित चार बूथों पर वोट का बहिष्कार किया गया। शेखपुरा के गदबदिया गांव के लोग 'रोड नहीं तो वोट नहीं' का नारा लगाते हुए वोट बहिष्‍कार करते दिखे। शेखपुरा विधानसभा अंतर्गत सुजावलपुर में बूथ नंबर 20 पर कम मतदान के पीछे सड़क नहीं रहने कोकारण बताया गया। औरंगाबाद के टिकारी विधानसभा में बूथ संख्या 121 (प्राथमिक विद्यालय सीता बिगहा) और बूथ संख्या 209 (उत्क्रमित मध्य विद्यालय थानापुर) पर भी 'रोड नही तो वोट नहीं' के नारे के साथ वोट बहिष्कार किया गया।
राजनीति में जातिवाद हावी
यह स्थिति तब है, जब राजनीतिक दलों से लेकर मतदाताओं के बड़े वर्ग में जातिवाद हावी है। प्रमुख दलों के चुनावी घोषणा पत्रों पर गौर करें तो आरक्षण व मंडल कमीशन से लेकर भ्रष्टाचार व राष्ट्रवाद तक के मुद्दे उठाए गए हैं। रोजगार व शिक्षा तथा युवाओं व महिलाओं से संबंधित मुद्दों को भी उठाया गया है। लेकिन कमोबेश सभी पार्टियों का फोकस जातियों पर ही है। चुनाव में प्रमुख दलों के उम्मीदवारों पर गौर करें तो स्पष्ट है कि उनका चयन चुनाव क्षेत्रों की प्रमुख जातियों के अनुसार किया गया है।
युवाओं में दिख रही आशा की किरण
चुनावी घोषणा पत्र अपनी जगह, पर राजनीतिक दल जातिवाद तथा ‘अगड़ा बनाम पिछड़ा’ पर ही फोकस करते नजर आ रहे हैं। लेकिन पहले चरण के मतदान में युवा व शिक्षित वोटरों का वोटिंग पैटर्न इससे अलग रहा। शायद यह अंधेरे में रोशनी की एक किरण है। 

Posted By: Amit Alok

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