नई दिल्ली [संजय मिश्र]। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी शिकस्त ने उसके समक्ष तमाम राजनीतिक चुनौतियों का पहाड़ खड़ा कर दिया है। इन सियासी मुसीबतों के बीच फिलहाल सबसे अहम कांग्रेस संसदीय दल के नेता के लिए चेहरे की तलाश है। पार्टी के अधिकांश दिग्गजों के चुनाव हार जाने की वजह से गांधी परिवार से इतर इस पद के दावेदार बड़े चेहरों का टोटा पड़ गया है।

लोकसभा में दिग्गजों के नहीं होने के कांग्रेस के इस संकट का अंदाजा इसी से मिलता है कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी के अलावा शशि थरूर और मनीष तिवारी ही ऐसे चेहरे हैं, जिनकी राष्ट्रीय स्तर पर पहचान है। मोदी की सुनामी में राहुल गांधी की युवा ब्रिगेड के लगभग सभी चेहरे भी चित हो गए हैं। इस राजनीतिक हालात में कांग्रेस के लिए राहुल गांधी को छोड़ दें तो शशि थरूर ही संसदीय दल के नेता के लिए सबसे प्रभावी चेहरे के तौर पर दिखाई दे रहे हैं। थरूर के अलावा हिन्दी भाषी चेहरों में मनीष तिवारी के सिवाय कांग्रेस के पास ज्यादा विकल्प नहीं बचे हैं।

17वीं लोकसभा में विपक्ष के सबसे बड़े चेहरे की तलाश करना कांग्रेस के लिए कितना मुश्किल है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पूरे हिन्दी प्रदेश से पार्टी केवल छह सीट ही जीत पायी है। इन आधा दर्जन सीटों में सोनिया गांधी की एक सीट भी शामिल है। पंजाब में कांग्रेस को आठ सीट जरूर मिली हैं, मगर मनीष तिवारी के अलावा अधिकांश चेहरों को राष्ट्रीय राजनीति के मंच पर अभी अपनी पहचान बनानी है।

केरल से कांग्रेस को सबसे ज्यादा सीट मिली है, मगर पार्टी की समस्या यह है कि इसमें शशि थरूर ही एकमात्र जाने-पहचाने नेता हैं। तमिलनाडु से पहली बार जीते कार्ति चिदंबरम की पहचान पिता पी चिदंबरम की वजह से है और अभी उन्हें कई मुकदमों का सामना करना पड़ रहा है। पश्चिम बंगाल के धुरंधर नेता अधीर रंजन चौधरी फिर से चुनाव जीतने में कामयाब रहे हैं, मगर संसदीय दल के नेता पद की जरूरतों के हिसाब से चौधरी फिट बैठेंगे इसमें संदेह है।

पिछली बार से भी ज्यादा बुरी स्थिति में कांग्रेस
पिछली लोकसभा में कांग्रेस बेशक 44 सीटों तक सीमित रही मगर संसदीय दल के नेता के रुप में मल्लिकार्जुन खडग़े सदन में विपक्ष के मुखर ही नहीं बेहद प्रभावी आवाज साबित हुए। इस लिहाज से खडग़े का चुनाव हारना पार्टी की संसदीय रणनीति के लिहाज से भी बड़ा झटका है। खडग़े के अलावा वरिष्ठ नेता वीरप्पा मोइली को भी शिकस्त का सामना करना पड़ा है। जबकि खडग़े के बाद कांग्रेस संसदीय दल के उपनेता ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी हार का मुंह देखना पड़ा है। सिंधिया के साथ लोकसभा में राहुल गांधी की युवा बिग्रेड के सदस्य रहे दीपेंद्र हुड्डा, सुष्मिता देव, रंजीत रंजन जैसे चेहरे भी चुनाव हार गए हैं। राजीव सातव ने माहौल भांप चुनाव ही नहीं लड़ा। राहुल की युवा ब्रिगेड के इकलौते चेहरे गौरव गोगोई जरूर दुबारा चुनाव जीतने में कामयाब रहे हैं। मगर गौरव का कद अभी संसदीय दल के नेता के मुफीद नहीं है।

राहुल गांधी क्यों नहीं
साफ है कि लोकसभा में दिग्गज चेहरों का टोटा देखते हुए संसदीय दल के नेता के लिए कांग्रेस के सामने राहुल गांधी ही पहला विकल्प बचते हैं। नई लोकसभा में भाजपा-एनडीए के भारी बहुमत को देखते हुए कांग्रेस संसदीय दल के नेता का चेहरा मौजूदा हालात में पार्टी के लिए ही नहीं बल्कि पूरे विपक्षी खेमे के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। कांग्रेस संगठन को मजबूत करने की सबसे बड़ी चुनौती को देखते हुए राहुल के लिए इस पद की जरूरत के हिसाब से न्याय करना आसान नहीं होगा।

शशि थरूर सबसे उपयुक्त विकल्प
मौजूदा हालातों में शशि थरूर ही कांग्रेस के लिए फिलहाल सबसे उपयुक्त विकल्प दिखाई दे रहे हैं। वाकपटु थरूर अंग्रेजी के साथ हिन्दी भी बोल लेते हैं। केंद्रीय राज्यमंत्री रह चुके थरूर को वैश्विक कूटनीति का भी व्यापक अनुभव है और लगातार तीसरी बार वे तिरूअनंतपुरम से लोकसभा के सदस्य चुने गए हैं। जबकि दूसरी बार लोकसभा में पहुंचे मनीष तिवारी केंद्र की पिछली यूपीए सरकार में स्वतंत्र प्रभार के राज्यमंत्री रह चुके हैं और लंबे समय से पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं।

हिन्दी भाषी राज्यों में जीतीं मात्र छह सीटें
हिन्दी भाषी राज्यों से कांग्रेस ने जो छह सीटें जीती हैं उनमें झारखंड से चुनी गईं गीता कोड़ा हों छत्तीसगढ से जीतीं ज्योत्सना चरणदास महंत और दीपक बैज सभी नये चेहरे हैं। वहीं पहली बार सांसद बने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के बेटे नकुलनाथ तो अभी सियासत का पहला अध्याय ही शुरू करेंगे। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की पत्नी प्रणीत कौर पार्टी के उन चंद चुने गए सांसदों में हैं जिन्हें पहचान का संकट नहीं।

नेता प्रतिपक्ष के लिए चाहिए 10 फीसद सीटें
Lok Sabha Election 2019 Results सामने आ चुके हैं और भाजपा ने अकेले बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया है। लोकसभा में बहुमत के लिए किसी भी दल को 272 सीटों की जरूरत होती है। भाजपा ने अकेले 303 सीटें जीती हैं। वहीं भाजपा नेतृत्व वाली एनडीए को कुल 352 सीटें प्राप्त हुई हैं, जो प्रचंड बहुमत है। इसके विपरीत कांग्रेस को मात्र 51 सीटें मिली हैं, जबकि कांग्रेस के गठबंधन वाले यूपीए को कुल 87 सीटें मिली हैं।

नियमानुसार लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का दर्जा प्राप्त करने के लिए किसी भी राजनीतिक दल को अकेले कम से कम 10 फीसद सीटें जीतनी होती हैं। लोकसभा में कुल 543 सीटों के लिए सीधा चुनाव होता है और 2 एंग्लो-इंडियन समुदाय के लोगों को राष्ट्रपति चुनते हैं। मतलब 545 सीटों वाली लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का दर्जा प्राप्त करने के लिए किसी भी राजनीतिक दल को कम से कम 55 सीटें जीतनी जरूरी हैं।

2014 में भी कांग्रेस को नहीं मिला था नेता प्रतिपक्ष का दर्जा
2014 में भी कांग्रेस को मात्र 44 सीटें प्राप्त हुई थीं, तब भी पार्टी को नेता प्रतिपक्ष का दर्जा नहीं मिला था। हालांकि, कांग्रेस लोकसभा में सबसे बड़ा विपक्षी दल था। इसलिए केंद्र की एनडीए सरकार कांग्रेस के नेता सदन मल्लिकार्जुन खडगे को सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता के रूप में जरूरी बैठकों में बुलाती रही है। मल्लिकार्जुन खड़गे ये कहते हुए इन अहम बैठकों का विरोध करते रहे कि जब तक उन्हें नेता प्रतिपक्ष का दर्जा नहीं दिया जाता, वह इस तरह की बैठकों में शामिल नहीं होंगे। यही वजह है कि लोकपाल की नियुक्ति समेत कई अहम बैठकों में मल्लिकार्जुन खड़गे शामिल नहीं हुए थे। इस बार भी कांग्रेस बहुमत तो दूर, नेता प्रतिपक्ष बनने लायक सीटें भी नहीं जीत सकी है।

 

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Posted By: Amit Singh