कोलकाता, जेएनएन। साढ़े तीन दशकों तक वाममोर्चा के प्रति वफादार रहने वाली बंगाल की जनता ने 2011 में जब तृणमूल कांग्रेस पर भरोसा जताया तो सबको यही लगा था कि वाममोर्चा की तरह ये सिलसिला भी लंबा चलेगा। बीते आठ साल ऐसा चला भी। 2011 के विधानसभा चुनाव के बाद किसी भी चुनाव में तृणमूल की हार नहीं हुई। नगर निकाय से लेकर लोकसभा तक प्रत्येक चुनाव में तृणमूल की सीटें और वोट फीसद बढ़ता चला गया। यहां तक कि 2014 के लोकसभा चुनाव में जबर्दस्त 'मोदी लहर' में भी तृणमूल ने बंगाल की 34 सीटों पर कब्जा जमाया लेकिन पिछले पांच साल में राज्य के मतदाताओं का मूड काफी बदल चुका है। 2019 के लोकसभा चुनाव के 'एक्जिट पोल' के बाद अब वास्तविक नतीजों में भी यह झलक रहा है।

रुझानों के मुताबिक, भाजपा 14 सीटों के फायदे के साथ बंगाल की 19 सीटों पर आगे चल रही है, जबकि तृणमूल 10 सीटों के घाटे के साथ 22 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है। उस समय तक भाजपा का वोट फीसद 38.92 फीसद दर्ज हुआ, वही तृणमूल का 44.76 फीसद देखा गया। ये रुझान अगर नतीजों में बदल गए तो भाजपा के लिए बंगाल में बहुत बड़ी सफलता होगी। गौरतलब है कि 2011 से पहले साढ़े तीन दशकों तक 50 फीसद से अधिक वोट बटोरकर बंगाल की सत्ता पर वाममोर्चा काबिज रहा। 15वें लोकसभा चुनाव के बाद बदलाव देखा गया। 2009 के आम चुनाव में वाममोर्चा को 43.28 फीसद वोट मिला, वहीं तृणमूल नीत फ्रंट की झोली में 45.09 प्रतिशत वोट आया।

इसके बाद 2011 के विधानसभा चुनाव में पूरा परिवर्तन हो गया यानी ज्यादातर मतदाता वामपंथी स्वभाव को त्यागकर लोग तृणमूल के रंग में रंग गए और तृणमूल, कांग्रेस व एसयूसीआइ गठबंधन को 48.44 फीसद और वाममोर्चा को 41.05 प्रतिशत वोट देकर 34 वर्षो के वामपंथी शासन का अंत कर दिया। तृणमूल के बंगाल की सत्ता पर काबिज होने के बाद धीरे-धीरे भाजपा का दबदबा बढ़ना शुरू हुआ और पिछले दो वर्षो में भाजपा राज्य में नंबर दो पार्टी बन गई। उलबेरिया संसदीय क्षेत्र में जहां 2014 के चुनावों में भाजपा का वोट फीसद 11.5 था, उपचुनाव में बढ़कर 23.29 फीसद हो गया। इसी तरह नोआपाड़ा विधानसभा सीट पर 2016 में जहां भाजपा को 13 फीसद वोट मिला था, वह उपचुनाव में 20.7 फीसद हो गया। पिछले साल हुए कंटाई विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में भाजपा 30 फीसद वोट के साथ दूसरे स्थान पर रही। अगस्त, 2017 के निकाय व 2018 के पंचायत चुनाव में भी भाजपा बंगाल में दूसरे स्थान पर रही थी।

जंगल में भी मंगल मनाने की तैयारी में भाजपा

भाजपा जंगलमहल में भी परचम लहराने की तैयारी कर रही है। मतगणना के दोपहर दो बजे तक के रुझानों के मुताबिक, भाजपा जंगलमहल की आठ सीटों में से पांच पर जीत हासिल करने की तरफ मजबूती से बढ़ रही है। बांकुड़ा से डॉ. सुभाष सरकार (3,22,604 वोट), विष्णुपुर से सौमित्र खां (3,23,646), मेदिनीपुर से दिलीप घोष (3,33,958), पुरुलिया से ज्योर्तिमय सिंह महतो (2,80,456) और झारग्राम से कुनार हेम्ब्रम (2,64,485 वोट) आगे चल रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस सिर्फ तीन सीटों पर ही आगे हैं। घाटाल से दीपक अधिकारी ऊर्फ देव (3,37,988), तमलुक से दिव्येंदु अधिकारी (2,98,987) और कांथी से शिशिर अधिकारी (3,47,186) आगे हैं।

गौरतलब है कि जंगलमहल में इससे पहले भाजपा का कभी खाता नहीं खुल पाया था। रुझानों के मुताबिक अगर उसे यहां एक बार में पांच सीटें मिल जाती हैं तो ये उसके लिए बहुत बड़ी जीत होगी और तृणमूल के लिए बहुत बड़ा झटका। तृणमूल ने 2014 के लोकसभा चुनाव में जंगलमहल की आठों सीटों पर कब्जा जमाया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तक ने यहां जमकर प्रचार किया था।

उत्तर बंगाल में क्लीन स्वीप की ओर भाजपा

उत्तर बंगाल में भाजपा क्लीन स्वीप की ओर बढ़ रही है। राज्य के उत्तरी भाग की आठों लोकसभा सीटों पर अपरान्ह 1.30 बजे तक भगवा पार्टी ने अच्छी-खासी बढ़त बनाए रखी थी। जलपाईगुड़ी में डॉ. जयंत कुमार राय (तत्कालीन समय तक प्राप्त वोट 1,42,772), कूचबिहार (एससी) में निशिथ प्रमाणिक (2,96,981), अलीपुरदुआर में जॉन बारला (2,86,422), रायगंज में देवश्री चौधरी (1,96,947), बालुरघाट में सुकांत मजुमदार (1,61,048), दार्जिलिंग में राजू बिष्ट (2,83,252), मालदा उत्तर में खगेन मुर्मु (2,02,501)और मालदा दक्षिण में श्रीरूपा मित्रा (1,02,426),चौधरी आगे चल रहे हैं। इनमें से कुछ सीटों पर भाजपा प्रत्याशियों ने 50,000 से भी ज्यादा की बढ़त बना ली है।

गौरतलब है कि इनमें से चार सीटों (जलपाईगुड़ी, कूचबिहार, अलीपुरदुआर और बालुरघाट) पर तृणमूल कांग्रेस, दो सीटों (मालदा उत्तर एवं मालदा दक्षिण) पर कांग्रेस और एक सीट पर माकपा (रायगंज) और एक (दार्जिलिंग) पर भाजपा का कब्जा था। भाजपा के आठों सीटें फतह कर लेने पर उसे न सिर्फ यहां एक बार में सात सीटों का फायदा होगा, बल्कि उत्तर बंगाल में उसका एकछत्र राज भी कायम हो जाएगा। तृणमूल के लिए न सिर्फ लोकसभा बल्कि 2021 में बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिहाज से भी यह बहुत बड़ा झटका होगा, वहीं यहां संसदीय चुनाव में कांग्रेस व माकपा का वजूद भी मिट जाएगा।

 

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