पटना [अरुण अशेष]। लोकसभा चुनाव के संदर्भ में अगर राजनीतिक दलों और दोनों बड़े गठबंधन की मनोदशा पर गौर करें तो कुछ बातें बहुत साफ नजर आएंगी। पहली-बीते लोकसभा चुनाव में सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाली भाजपा सहमी हुई है और आशंकित भी। वाजिब है। उसके पास पाने के बदले खोने के लिए बहुत कुछ है।

पांच जीती हुई सीटें भाजपा चुनाव मैदान में जाने से पहले हार चुकी है। यह सीटें सहयोगी जदयू को मिलने जा रही है। हां, भाजपा के इस त्याग को रणनीतिक जीत के रूप में भी देखा जा रहा है। कह सकते हैं कि उसने थान हारने के बदले गज हारने का फैसला किया है।

दूसरी-जदयू के हिस्से खोने के लिए कुछ नहीं है। पाने की उम्मीद अधिक है। वह दो सीटों पर जीती थी। बहुत खराब प्रदर्शन हो, उस हालत में भी वह फायदे में रहेगा। वजह ये है कि नीतीश कुमार के रूप में उसके पास एक विश्वसनीय चेहरा है। ठीक ऐसा ही चेहरा और किसी दल के पास नहीं है।

तीसरी-महागठबंधन के पास दलों की संख्या अधिक हो गई है। लेकिन, वोट जुगाड़ करने वाले चेहरे कम ही हैं। ये ऐसे चेहरे हैं जिनके पास अपने दम पर चुनाव लडऩे का तजुर्बा तक नहीं है। लिहाजा यह तय करना मुश्किल है कि वोट बटोरने की उनकी वास्तविक क्षमता कितनी है।

हम या रालोसपा जैसी नवोदित पार्टियां क्रमश: एक और दो चुनाव गठबंधन के नेतृत्व में ही लड़ी हैं। एक विकासशील इंसान पार्टी और दूसरा लोकतांत्रिक जनता दल को पहली बार चुनाव लडऩे का मौका मिलेगा। इसीलिए इनके आधार के बारे में अभी ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता है।

जबकि भाजपा, राजद, जदयू, कांग्रेस और लोजपा जैसी पार्टियों को अकेले और गठबंधन के साथ भी चुनाव लडऩे का अनुभव है। इसीलिए इन दलों को अपनी सीमाओं का ज्ञान है। यह ज्ञान सौदेबाजी के समय नजर आता है, जब 30 सीट पर लड़ी भाजपा 17 पर और 38 सीट पर लड़ा जदयू 17 पर लडऩे के लिए राजी हो जाता है।

ऐसा ही परिपक्व नजरिया राजद का भी है। सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद वह अधिकतम सीटों पर लडऩे की जिद नहीं कर रहा है। चुनावी उम्र के लिहाज से वह न्यूनतम सीटों पर लडऩे के लिए राजी है। लोकसभा चुनाव में राजद अबतक सबसे 27 सीटों पर लड़ा है।

संकेत है कि भाजपा को परास्त करने के प्राथमिक लक्ष्य के तहत वह उससे कम सीटों पर लडऩे के लिए राजी है। दोनों गठबंधन में एक समानता साफ नजर आ रही है कि बड़े घटक दल बड़प्पन दिखा रहे हैं, जबकि छोटे दल जिद पर अड़े हुए हैं।

एनडीए ने लोजपा की जिद का सम्मान किया। दबाव झेलने की ऐसी ही अपेक्षा महागठबंधन में राजद से की जा रही है। लोजपा को खुश करने के फेर में एनडीए को रालोसपा से हाथ धोना पड़ा। महागठबंधन भी इस आशंका से मुक्त नहीं है। उसे भी मन माफिक सीट न मिलने पर अलग होने की धमकी मिल रही है। 

लहर की उम्मीद नहीं

चुनाव में अभी समय है। कह नहीं सकते कि किस मुददे पर कोई लहर चल पड़े और अभी के सभी मुददे परिदृश्य से ओझल हो जाएं। सवर्ण आरक्षण नया मुद्दा है। अगर इस पर समाज के बड़े हिस्से की प्रतिक्रिया होती तो मंडल की तरह यह मुददा बन सकता था। लेकिन, फिलहाल ऐसा नहीं लगता है कि सवर्ण आरक्षण के खिलाफ कोई बड़ी गोलंबदी होने जा रही है। बिना इसका विरोध किए आरक्षण का दायरा बढ़ाने की मांग की जा रही है। इसका भी कहीं से विरोध नहीं हो रहा है।

अभी के मुददे ही लोकसभा चुनाव तक कायम रहेंगे, यह उम्मीद की जा सकती है। पिछले चुनावों के वोट के आधार पर आकलन करें तो एनडीए को बढ़त है। लेकिन, उसके साथ एंटी इंकमबैंसी फैक्टर भी लागू है। लोकसभा चुनाव राष्ट्रीय मुददे पर लड़ा जाता है। वोट के समय लोग जरूर आकलन करेंगे कि चुनाव के दिनों किए गए वायदों का क्या हुआ। 

काबू पाने वाले की जीत

लहर न चले और पुराने वायदे पूरे न हों तो ज्यादा सांसदों के लिए दूसरा चुनाव कष्टकारी ही होता है। जाहिर है, यह कष्ट जिन सांसदों को उठाना होगा, वे एनडीए के ही अधिक हैं। एनडीए के पास समय है। ऐसे सांसदों की पहचान कर उन्हें बेटिकट किया जा सकता है और एनडीए अच्छे उम्मीदवारों का चयन कर सकता है।

ठीक यही सुविधा महागठबंधन के पास नहीं है। उसके सभी दलों के पास उम्मीदवारों की फौज है। एक से एक जिद्दी उम्मीदवार। टिकट न मिले तो किसी दल में चले जाएं। दल न मिले तो निर्दलीय मैदान में कूद पड़ें।

सबसे बड़े दल राजद के सामने जिद्दी उम्मीदवारों की बड़ी फौज भी है। यहां आकर एक तस्वीर बनती है। अगले चुनाव में बागियों को संतुष्ट करना दोनों गठबंधन के लिए चुनौती होगी, जो इस पर काबू पाएगा, बाजी उसके हाथ आएगी।

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