जमशेदपुर, वीरेंद्र ओझा।  जमशेदपुर लोकसभा सीट सामान्य श्रेणी में आता है, लिहाजा यहां प्रमुख दलों ने गैर आदिवासी उम्मीदवार ही दिए हैं। भाजपा, कांग्रेस या झामुमो ने भी उम्मीदवारों के चयन में गैर आदिवासी को प्राथमिकता दी। 1989 के चुनाव में झामुमो से शैलेंद्र महतो के बाद यह सीट महतो के लिए सुरक्षित समझा जाने लगा।

शैलेंद्र 1991 का भी चुनाव जीत गए, तो इस धारणा पर मुहर लग गई। यही नहीं, 1996 में भाजपा के टिकट पर महाभारत के कृष्ण नीतीश भारद्वाज करिश्माई व्यक्तित्व की वजह से जीत गए, लेकिन इसके बाद 1998 व 1999 में भी भाजपा से आभा महतो चुनाव जीतीं। 2004 में झामुमो से सुनील महतो और उनकी हत्या के बाद उनकी पत्नी सुमन महतो 2007 में जीतीं। लगातार महतो उम्मीदवारों की जीत से सभी प्रमुख दलों ने यह मान लिया कि जमशेदपुर सीट से थोड़ी भी पहचान रखने वाले महतो को टिकट मिल जाए, तो जीत की संभावना बढ़ जाएगी। 

अंतिम समय में कट गया था आस्तिक का टिकट

आस्तिक महतो। 

यही वजह रही कि इस बार के चुनाव में भाजपा के सांसद विद्युत वरण महतो के मुकाबले झामुमो से आस्तिक महतो को टिकट मिलना लगभग तय हो गया था। पहले एक बार बहरागोड़ा के विधायक कुणाल षाड़ंगी का नाम उछला था, लेकिन उनके मना करने पर कांटा फिर आस्तिक महतो पर अटक गया। आस्तिक के नाम से भाजपा में भी बेचैनी बढ़ गई, क्योंकि महतो वोटरों की संख्या करीब तीन लाख है। भाजपा को लगा कि आस्तिक महतो वोट पूरा नहीं तो आधा भी ले गए तो विद्युत की जीत में रोड़े आ सकते हैं। इसके बाद पता नहीं अंदरखाने में क्या खेल शुरू हुआ कि ईचागढ़ के पूर्व विधायक अरविंद सिंह उर्फ मलखान सिंह का नाम उछलने लगा। यहां तक बात होने लगी कि अरविंद कभी भी झामुमो में शामिल हो सकते हैं। फिलहाल अरविंद झाविमो से इस्तीफा देने के बाद करीब तीन साल से किसी भी दल में नहीं हैं। अरविंद को टिकट मिलने की बात पक्की नहीं हो रही थी, क्योंकि झामुमो में ही एक बड़ा तबका उनको टिकट देने का विरोध कर रहा था। कहते हैं कि सरायकेला के विधायक चंपई सोरेन ही अरविंद के पैरोकार बन रहे थे।

चंपई की घोषणा थी चौंकाउ

चंपई सोरेन। 

टिकट दावेदारी में चंपई सोरेन का कहीं नाम भी नहीं था, लेकिन झामुमो ने जब चंपई को टिकट देने की घोषणा कर दी तो हर कोई अवाक रह गया। इसकी वजह थी कि चंपई का कार्यक्षेत्र कभी भी जमशेदपुर नहीं रहा। वे तो पांच बार से सरायकेला के ही विधायक रहे हैं। अलबत्ता झारखंड सरकार में कल्याण मंत्री रहने के नाते जमशेदपुर में थोड़ा-बहुत सक्रिय रहते थे। वैसे झामुमो में चंपई का कद बड़ा है, जिसके नाते उन्हें संगठन का लाभ मिलने की ज्यादा संभावना लगी। इन सबके बावजूद विद्युत की जीत में आस्तिक के होने से जो बाधा हो सकती थी, उससे छुटकारा अवश्य मिल गया। भाजपा या विद्युत इस बात से निश्चिंत हो गए कि महतो वोटर अब उनके पास ही रहेगा। हालांकि तृणमूल कांग्रेस से अंजना महतो के अलावा निर्दलीय दिनेश महतो भी चुनावी मैदान में थे, लेकिन इनका प्रभाव क्षेत्र इतना सीमित रहा कि इनसे विद्युत महतो को विशेष नुकसान नहीं हुआ। इस चुनाव में ऐसा दिख भी रहा है।

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Posted By: Rakesh Ranjan

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