रांची, [आरपीएन मिश्रा]।  Jharkhand Assembly Election 2019 - झाारखंड में दूसरे चरण की आदिवासी बहुल 20 सीटों पर मतदाता अपना फैसला ईवीएम में बंद कर चुके हैं। संख्या में 50 फीसद से भी ज्यादा दखल रखने के कारण इन सीटों पर आदिवासी निर्णायक भूमिका में हैं। इन सीटों के रास्ते सियासतदानों को सत्ता की दहलीज तक पहुंचाने में राज्य की मूल पहचान से जुड़े ये आदिवासी किंगमेकर की भूमिका निभाते है।

थोड़ी जागृति आने के बाद अब ग्रामीण इलाके के सामान्य आदिवासी वोटर इतनी समझ रखते हैं कि उनके वोट से कोई नेता चुना जाएगा, किसी की सरकार बनेगी और राज्य व देश का विकास होगा। इस विकास में उनका अपना विकास भी शामिल है। हालांकि विकास और भविष्य की अलग-अलग और सही-गलत दोनों तरह की व्याख्याएं समझाकर सियासतदां उन्हें अपने-अपने खेमे में करने की हरसंभव कोशिश भी करते हैं।

इन सबके बीच अपना वोट दे चुके आदिवासियों के चेहरे पर लोकतंत्र के जश्न में शामिल होकर देश गढ़ने में भागीदार बनने का संतोष और गौरव साफ झलकता है। वोट दे चुके सोनामन हो भाषा में कहते हैं - अबुआ वोट दिशोमे बेनावा.... (हमारा वोट देश बनाएगा)। उनके सुर में सुर मिलाते हुए छोटका मांझी कहते हैं - अबी रस्का गे बो वोट के आ नेता बो उदू केदेया (हम वोट देकर बहुत खुश हैं, हमने अपने नेता चुन लिया है)। आदिवासी वोटरों का यह संतोष लोकतंत्र में उनकी बढ़ती भूमिका को दर्शाता है। यह संतोषजनक है।

झारखंड में 7 दिसंबर को जिन 20 सीटों पर चुनाव हुआ, वह वीरों, धनुर्धरों और पराक्रमियों की धरती रही है। गौरवमयी इतिहास समेटे ये आदिवासी लक्ष्य का संधान करने की क्षमता तो रखते हैं लेकिन कभी साजिशन तो कभी लक्ष्य से भटकाव के कारण ये चूकते भी रहे हैं। जल-जंगल-जमीन के अहम मुद्दे खुद में समेटे इन इलाकों से गरीबी, बेरोजगारी, पलायन, मानव तस्करी, पानी की कमी जैसी समस्याएं दूर हो जाएं तो लोगों की किस्मत बदल सकती है।

खास बात यह है कि दुनियाभर में आदिवासियों के हितों की  पैरोकारी करने से लेकर झारखंड आंदोलन को जन्म देने वाले मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा और उलगुलान आंदोलन छेड़कर झारखंड में भगवान सा दर्जा हासिल कर चुके बिरसा मुंडा का खूंटी इलाका भी इसी चरण की सीटों में शामिल है। वहीं  पूर्वी और पश्चिमी सिंहभूम की 14 सीटों वाले कोल्हान इलाके की जिन 13 सीटों  पर 7 दिसंबर को चुनाव हुआ, वहीं से कभी सामंती व्यवस्था और अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष का बिगुल फूंका गया था।

तब कोल विद्रोह को अंग्रेजों ने भले ही कुचल दिया हो, लेकिन इस आंदोलन ने प्रशासनिक सुधारों की जमीन तैयार कर दी थी। मतलब संघर्ष से सफलता हासिल करने का माद्दा यहां की माटी में है। विपरीत परिस्थितियों में जीना भी इन्हें आता है और जूझना इनके स्वभाव में है। ये वो गुण हैं जिनका होना किसी भी लक्ष्य को हासिल करने की गारंटी माना जाता है। इनके बीच आ रही जागृति भविष्य में सुखद परिणाम दे सकती है। राज्य में नए युग का सूत्रपात कर सकती है।

क्षमताओं की कमी नहीं, संभावनाएं भी मौजूद

इन इलाकों की और खासियतों का जिक्र करें तो पूर्वी सिंहभूम और पश्चिमी सिंहभूम के इलाकों में खनिज और खूंटी, सिमडेगा में वन संपदा इनकी किस्मत बदलने की क्षमता रखती है। इस इलाके के खिलाड़िय़ों और चैंपियन बेटियों के हॉकी और तीरंदाजी में लगातार शानदार प्रदर्शन की दुनिया कायल रही है। जंगलों से घिरे इन इलाकों के एकलव्य अंगूठा कट जाने के बाद भी बिना विचलित  हुए लक्ष्य का संधान करने में माहिर हैं, लेकिन उनका नादान भोलापन अबतक उन्हें बरगलाए जाने का सबब बनता रहा है।

इस व्यूह को तोड़ऩा ही आदिवासी  वोटरों के सामने बड़ी चुनौती रही है। जंगलों और परंपरा से जुड़े आदिवासियों की  बात करें तो भौगोलिक क्षेत्र भले ही अलग रहा हो, लेकिन आदिवासी समाज ने ही  पांडवों को अज्ञातवास के दौरान पनाह दी थी, इसी समाज की शबरी के आतिथ्य और संस्कार ने भगवान राम को भी प्रभावित किया था, लेकिन एकलव्य का अंगूठा कटवा लिए जाने से लेकर लाक्ष्यागृह में पांडवों को जलाकर मार डाले जाने की साजिशों को भी इन भोले-भाले आदिवासियोंं के इलाके में ही अंजाम दिया जाता रहा। चुनाव के रूप में इस बार भी अचूक और अमोघ अस्त्र आदिवासियों के हाथ आया है। अब देखना है कि वोटरों ने इसमें कितनी सूझबूझ दिखाई।

Posted By: Sujeet Kumar Suman

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