रांची, [नीरज अम्बष्ठ]। Jharkhand Election Result 2019 - राज्य में कभी दिग्गजों में शुमार रहे कई बड़े नेताओं के पुराने दिन वापस नहीं आ रहे हैं। इनमें से कई बार-बार दल भी बदल रहे हैं लेकिन उनका भाग्य नहीं बदल रहा है। ऐसे लगभग एक दर्जन नेता हैं। इनमें से तो कई पूर्व में मंत्री, सांसद और विधायक रह चुके हैं। बात करते हैं राज्य के पहले ऊर्जा मंत्री लालचंद महतो की। झारखंड की पहली कैबिनेट में ये ऊर्जा मंत्री थे। लेकिन वर्ष 2005 में इनकी हार हुई तो वापसी ही नहीं हुई।

पहले जदयू में थे, 2014 के विधानसभा चुनाव के पहले भाजपा में शामिल हो गए। भाजपा ने इन्हें टिकट भी दिया, लेकिन जीत से थोड़ी दूर रह गए। इस विधानसभा चुनाव में जदयू में वापसी कर अपना भाग्य आजमाया, लेकिन तेरहवें स्थान पर पहुंच गए। यही हाल राज्य में दो-दो बार मंत्री रहे जलेश्वर महतो का हुआ। जदयू के दिग्गज नेताओं में शामिल रहे जलेश्वर महतो 2009 और 2014 में हार के बाद इस साल लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी छोड़ कांग्रेस में चले गए।

कांग्रेस ने इनपर भरोसा जताते हुए बाघमारा से टिकट भी दिया, लेकिन ये भाजपा के विधायक ढुल्लू महतो से पार नहीं पा सके। हालांकि इन्होंने ढुल्लू को कड़ी टक्कर दी, लेकिन किस्मत ने इनका इस बार भी साथ नहीं दिया। कभी गोपाल कृष्ण पातर उर्फ राजा पीटर ने तमाड़ उपचुनाव में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिबू सोरेन को हराकर सुर्खियां बंटोरी थी। उस समय वे झारखंड पार्टी (झापा) के टिकट पर चुनाव लड़े थे। बाद में वे जदयू में शामिल हो गए और 2009 के विधानसभा चुनाव में जीत भी हासिल की।

मंत्री बनने का भी मौका मिला। लेकिन वर्ष 2014 के विधानसभा चुनाव से पहले वे भाजपा में चले गए। यहां टिकट नहीं मिला तो निर्दलीय चुनाव लड़ गए। इसमें उनकी हार हो गई। पूर्व मंत्री रमेश सिंह मुंडा की हत्या के आरोप में जेल में बंद राजा पीटर को कोर्ट ने इस बार चुनाव लडऩे की स्वीकृति तो दे दी, लेकिन उनकी स्थिति यह हो गई कि चौथे स्थान पर चले गए।

इस बार पीटर ने एनसीपी के टिकट पर चुनाव लड़ा था। इसी तरह, बरकट्ठा से झाविमो प्रत्याशी बटेश्वर मेहता इस बार भी कुछ खास नहीं कर सके। जदयू के पुराने नेता रहे बटेश्वर ने पिछला चुनाव झामुमो के टिकट पर लड़ा था। इस बार मेहता ने झाविमो में शामिल होकर चुनाव लड़ा, लेकिन जीत दूर ही रही।

दो सीटों पर लड़े पूर्व सांसद, दोनों पर करारी हार

पूर्व सांसद सालखन मुर्मू ने भी कई पार्टिंया बदलीं, लेकिन वे कुछ खास नहीं कर सके। 1977 में ये ऑल इंडिया झारखंड पार्टी के अध्यक्ष थे। 1996 में भाजपा में शामिल हो गए जिसके टिकट पर ओडिशा के मयूरभंज से 1998 व 1999 में लोकसभा सदस्य चुने गए। इसके बाद कुछ खास नहीं कर सके। वर्ष 2002 में अपनी पार्टी झारखंड दिशोम पार्टी का गठन किया। बाद में बसपा व जेडीपी में भी गए। इस बार चुनाव से पहले जदयू के प्रदेश अध्यक्ष बन गए और दो-दो सीटों मझिआंव व शिकारीपाड़ा से चुनाव लड़ा। दोनों जगहों पर इनकी करारी हार हुई।

... इधर, कुछ अपवाद भी

कुछ नेता अपवाद हैं जो चाहें जिस दल में रहें जीत ही जाते हैं। हटिया के विधायक नवीन जायसवाल इनमें शामिल हैं। उन्होंने सबसे पहले आजसू के टिकट पर हटिया से उपचुनाव जीता था। ढाई साल बाद 2014 में यह सीट गठबंधन के तहत भाजपा में चली गई। तब आजसू छोड़कर उन्होंने झाविमो का दामन थाम लिया और चुनाव भी जीता। चुनाव जीतने के बाद भाजपा में चले गए। इस बार वे भाजपा से चुनाव लड़े और अपनी सीट बचाने में कामयाब रहे।

शॉर्ट मे जानें सभी बड़ी खबरें और पायें ई-पेपर,ऑडियो न्यूज़,और अन्य सर्विस, डाउनलोड जागरण ऐप

budget2021