हजारीबाग के चुरचू क्षेत्र से वरिष्ठ संवाददाता विकास कुमार। Jharkhand Election 2019 मांडू विधानसभा क्षेत्र के चुरचू प्रखंड अंतर्गत बहेरा पंचायत के आदिवासी बहुल गांव फुसरी में सुबह 9 बज रहे हैं। स्थानीय सरकारी विद्यालय में शिक्षक जेठुवा मांझी बच्चों को पढ़ाते नजर आते हैं। उन्होंने स्नातक करने के बाद डीपीएड का प्रशिक्षण लिया है और वर्षों से स्थानीय बच्चों को शिक्षित करने में लगे हैं। बताते हैं, गांव की स्थिति बहुत ही खराब है। यहां की सड़क जर्जर है। पेयजल की अनुपलब्धता भी यहां की मूल समस्या है।

आगे कहते हैं, लोकसभा हो या विधानसभा का चुनाव, नेता यहां आते हैं, आश्वासन देकर चले जाते हैं। फिर कोई भी गांव की तस्वीर बदलने कभी नहीं पहुंचता। यहीं की शिक्षिका गीता तिवारी कहती है कि वे यहां 14 वर्षों से कार्यरत हैं। उनसे व मौजूद अन्य लोगों से बातचीत के क्रम में पता चलता है, कि गांव में सस्याएं तो कई हैं। पीने के पानी के लिए पांच किलोमीटर जाना पड़ता है। सरकारी योजना से एक भी घर नही बना।

इन सबके बीच ग्रामीण विस्थापन को सबसे बड़ी समस्या मानते हैं। थोड़ी दूर आगे जाने पर संजय मुर्मू से भेंट होती है। वे विस्थापन की चर्चा करते हैं। बताते हैं कि कोयला खनन के मकसद से सरकारी कंपनी के लिए 1985 में हम आदिवासियों की 906 एकड़ भूमि अधिग्रहीत की गई थी और मुआवजा तथा नौकरी का आश्वासन दिया गया था। लेकिन आज तक न तो उचित मुआवजा मिला न ही सबको नौकरी। 200 लोगों में मात्र 37 को ही नौकरी दी गई। संजय विस्थापन को लेकर आंदोलन कर रहे रामकिशोर मुर्मू और मनु टुडू से मिलाते हैं। वे कहते हैं, सैकड़ों बार आंदोलन करने के बाद भी हमें केवल आश्वासन ही मिलता है।

हमेशा लोकतंत्र की बात करने वाले ग्रामीण विकास की दौड़ में काफी पीछे छूटे नजर आते हैं। डेढ़ हजार लोगों की आबादी वाले इस संताल आदिवासी बहुल आदिवासी गांव में मात्र 10 लोग ही स्नातक हैं। अन्य कई विद्यार्थी मैट्रिक-इंटर की पढ़ाई कर रहे हैं।

गांव की सड़कों की बात करें तो फुसरी चौक से सिंघाड़ा टोला तक तीन किलोमीटर की सड़क ऊबड़-खाबड़ है। इससे गांव से मुख्य मार्ग तक आने में कठिनाई होती है। मनु टूडू बताते हैं कि यहां के लोग परेशान हैं। सबसे बड़ी पार्टी भी यहां कुछ नहीं कर पाई और गांव की समस्या में कोई परिवर्तन नहीं आया।

शुद्ध पानी के लिए जाना पड़ता है पांच किलोमीटर दूर

आगे जाने पर चौक की दुकान में गणेश मांझी से भेंट होती है। वे मुखिया का चुनाव लड़ चुके हैं। बताते हैं कि सोचा था कि जीतकर गांव की तस्वीर बदल दूंगा पर हो ना सका। बताते हैं कि गांव के सलगाटोला  सिंघाङा टोला, तिरिल गुट्टू टोला, छप्पर कोचा, मांझी टोला समेत अन्य टोलों में शुद्ध पानी की किल्लत है। यहां एक अच्छा चापाकल भी नहीं है, जो है उसमें आयरन युक्त पानी निकलता है जिसका उपयोग करने पर गांव के कई लोग बीमार हो जाते हैं। मजबूरन पांच किलोमीटर दूर सीसीएल की तापीन साउथ कॉलोनी जाकर शुद्ध पानी लाना पड़ता है।

इस पर संजय मुर्मू बोलते हैं कि महिलाएं एनीमिया, थायराइड जैसी कई बीमारियों से ग्रस्त हो चुकी हैं। गांव में एक भी उप स्वास्थ्य केंद्र नहीं है इलाज के लिए आठ किलोमीटर दूर चरही उप स्वास्थ्य केंद्र अथवा हजारीबाग सदर अस्पताल जाना पड़ता है। दिन-रात माइंस की धूल उडऩे और हाइवा के चलने से प्रदूषण में वृद्धि हुई है। दमा-सांस संबंधी बीमारियां भी लोगों को होने लगी हैं। बात करने के क्रम में जगदीश मांझी उत्सुकतावश हमारे पास आते हैं और बताते हैं कि गांव में अधिकांश लोगों के पास राशन कार्ड भी नहीं है। आयुष्मान कार्ड भी नहीं मिला है। यहां एक मोटरसाइकिल मिस्त्री भी हैं बिहारी मांझी। बताते हैं कि विस्थापित होने के बाद नौकरी नहीं दिए जाने से ऊबकर बेरोजगार युवा महाराष्ट्र, दिल्ली, मुंबई राजस्थान आदि पलायन कर गए और मजदूरी कर रहे हैं। वहीं, स्थानीय युवा कोयला ढोकर अपना और परिवार का पेट पालने को विवश हैं।

संजय मुर्मू बताते हैं कि प्रखंड का एकमात्र फुसरी गांव ही ऐसा है जहां एक भी लाभुक के लिए इंदिरा आवास का निर्माण नहीं किया गया है। इस बाबत बहरा पंचायत के मुखिया बबली पीटर होरो ने बताया कि प्रखंड में आवास निर्माण के लिए भूमिका विवरण पत्र देना होता है लेकिन सीसीएल यहां के ग्रामीण विस्थापितों को अनापत्ति प्रमाण पत्र निर्गत नहीं कर रही। जिससे आजादी के बाद से अब तक डेढ़ हजार आबादी वाले इस आदिवासी ग्राम में एक भी इंदिरा आवास का निर्माण नहीं हुआ है।

दोपहर के एक बज चुके हैं। ग्रामीण महिलाएं नजर आती हैं। बताती हैं, यहां हमारे लिए कुटीर उद्योग खोलकर चूड़ी, बाला आदि के निर्माण व प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई थी। अब वह भी बंद हो चुका है। ग्रामीण कहते हैं, हर बार विधायक-सांसदों द्वारा सर्वांगीण विकास की बात की जाती है। झारखंड बनने के 19 वर्षों बाद भी हमारा गांव उसी स्थिति में हैं जो अविभाजित बिहार में था। न कोई विधायक और न ही कोई सांसद हमारी सुध लेता है। आदिवासी कहकर हमारे आदिवासी नेता ही हमें ठगते आ रहे हैं, ऐसे में भविष्य में हम किसे चुनें, यह समझ में नहीं आता।

Posted By: Alok Shahi

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