रांची, [प्रदीप शुक्ला]। Maharashtra Politics कानपुर शहर से कभी भी किसी तरह का जिनका वास्ता रहा है, और वह मिठाई खाने के शौकीन हैं, तो वहां की एक मशहूर दुकान को जरूर जानते हैं- ठग्गू के लड्डू। इनके लड्डू की खासियत तो वही जानते हैं जिन्होंने इसे खाया है, लेकिन अपने ब्रांड को प्रमोट करने का उनका नुस्खा काफी नायाब है। दरअसल वह दावा करते हैं, ऐसा कोई सगा नहीं जिसको हमने ठगा नहीं। बेशक, उन्होंने अपने किसी सगे-संबंधी को नहीं ठगा हो, लेकिन इसे झारखंड की सियासत पर फिट कर दें तो शत प्रतिशत सच साबित होगा।

महाराष्ट्र में तो यह आज हो रहा है, इसके पहले कर्नाटक में भी खूब पॉलिटिकल ड्रामा हुआ। झारखंड तो ऐसे सियासी तमाशों का बराबर गवाह बनता रहा है। सीधे शब्दों में कहें तो देशभर में इस वन प्रदेश के दलबदल और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए नेताओं की दगाबाजी की मिसाल दी जाती रही है। झारखंड राज्य गठन के बाद से ही यहां के राजनीतिक दल, नेता छोटे-छोटे स्वार्थ के लिए अपने-पराये किसी को भी ठगने में गुरेज नहीं करते रहे हैं। बीते एक सप्ताह में भारतीय जनता पार्टी- आजसू के बीच गठबंधन को लेकर हुई रार और रघुवर सरकार में लगभग पांच वर्षों तक कैबिनेट मंत्री रहे सरयू राय के बगावती तेवर समेत तमाम नेताओं के दल- बदल से यह एक बार फिर जगजाहिर हो गया है, और यह तो बस शुरुआत है।

अगर मतदाता थोड़ा भी भ्रमित हुआ तो 23 दिसंबर के बाद अपनों को ठगने का जो दौर शुरू होगा, वह कम दिलचस्प नहीं होगा। पांच वर्षों तक भाजपा सरकार में साथी रही आजसू पार्टी आखिरी समय तक मोल-भाव में जुटी रही। आजसू के अध्यक्ष सुदेश महतो इसमें काफी माहिर माने जाते हैं। उनका यह भी इतिहास रहा है कि वह कभी सत्ता से दूर नहीं रहे हैं। जिसकी सत्ता, सुदेश उसके साथ। इसीलिए झामुमो के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन उन पर हमलावर हैं। वह कह रहे हैं कि वह भाजपा की बी टीम हैं और चुनाव बाद वह रघुवर की गोद में बैठ जाएंगे।

खैर, मतदाता इस पर कितना ध्यान देगा पता नहीं, लेकिन सुदेश महतो ने जिस तरह से भाजपा को आखिर तक उलझाए रखा, इसका नतीजा यह हुआ कि भाजपा जो नौ सीटें आजसू के लिए छोड़कर चल रही थी, वहां कोई पहले से बहुत तैयारी नहीं की। यही वजह है कि वहां भाजपा बहुत मजबूत प्रत्याशी देने की स्थिति में नहीं है। पांच वर्षों तक सत्ता में साथी रहे सुदेश अब बिजली सहित कई अन्य मुद्दे उठा रहे हैं और सरकार से सवाल कर रहे हैं। वे इस बात को भूल रहे हैं कि मतदाता उनसे भी सवाल पूछ सकते हैं। सरकार में थे, तब आपने क्या किया? वैसे माना तो यह भी जाता है कि मतदाताओं की याददाश्त बहुत ज्यादा नहीं होती है। यह बार-बार, चुनाव दर चुनाव जाहिर होता रहता है।

कुछ ऐसा ही हाल रघुवर दास सरकार में पांच साल तक कैबिनेट मंत्री रहे सरयू राय का भी है। वह पिछले आठ-दस महीने से बगावती तेवर अपनाए हुए थे। कई बार सरकार के साथ-साथ मुख्यमंत्री रघुवर दास को सीधे घेरते रहे हैं। सरकार और संगठन पर दबाव बनाने के लिए इस्तीफे का नाटक भी करते रहे, लेकिन दिया नहीं। सरकार का पूरा सुख भोगा और टिकट वितरण में भी आखिर तक इंतजार किया। जब समझ गए कि प्रदेश से लेकर केंद्रीय संगठन ने उनके इस ‘बगावती आचरण’ को गंभीरता से लिया है और बात नहीं बनने वाली है तो मुख्यमंत्री के खिलाफ ताल ठोंक कर खड़े हो गए। अब उन्हें बहुत कुछ याद आ रहा है जो वह आने वाले दिनों में मतदाताओं के सामने रखेंगे, लेकिन वह यह भूल रहे हैं कि मतदाता यह भी तो पूछ सकते हैं कि पांच वर्ष तक जब आप सरकार में शामिल थे, तब विरोध करते हुए सत्ता क्यों नहीं त्यागी?

खैर, राजनीति में यह कोई नई बात नहीं है। महाराष्ट्र से लेकर झारखंड तक यही नाटक चल रहा है। झारखंड में चुनाव से ठीक पहले लगभग सभी दलों में पाला बदलने का एक सिलसिला सा चला हुआ है। झारखंड मुक्ति मोर्चा ने तो अभी तक अपने सभी प्रत्याशी घोषित नहीं किए हैं। वह इंतजार कर रही है कि भाजपा की पूरी सूची आ जाए, ताकि उनकी घोषणा के बाद पार्टी के विक्षुब्ध कहीं उधर ही न खिसक जाएं। हकीकत भी है, इस चुनाव में दो दर्जन विधायक अब तक अपना दल बदल चुके हैं।

प्रदेश अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहे नेता कपड़े की तरह दल बदल रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ताला मरांडी झामुमो, कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुखेदव भगत भाजपा, एक और पूर्व अध्यक्ष प्रदीप कुमार बलमुचू आजसू का दामन थाम चुके हैं। वहीं, कांग्रेस के ही एक और प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अजय कुमार अब राज्य में आम आदमी पार्टी के झंडाबरदार हैं। निष्ठा ताक पर है, स्वार्थ की राजनीति चरम पर।

[स्थानीय संपादक, झारखंड]

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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