रांंची, जेएनएन। Jharkhand Assembly Election 2019 - खूंटी, सिमडेगा और सिसई से लेकर कोल्हान के सभी आदिवासी बहुल इलाकों मेंं जल-जंगल-जमीन एक बड़ा मुद्दा है। इतना ही नहीं गरीबी, बेरोजगारी, पलायन और मानव तस्करी, अंधविश्वास और धर्मांतरण तक के मुद्दे भी यहां छाए रहते हैं। विकास विरोधी नक्सली अलग से समस्याएं खड़े करते रहते हैं। अभी तक ये इलाके पूरी तरह नक्सली हिंसा से मुक्त नहीं हो पाए हैं।

नक्सलियों को सीमावर्ती छत्तीसगढ़ और ओडिशा के उग्रवादियों का भी समर्थन  मिलता है। वहीं इन इलाकों में अंधविश्वास से पार पाना भी एक बड़ी चुनौती है। आए दिन डायन बिसाही और तंत्र-मंत्र के नाम पर हत्या और प्रताडऩा कखबरें भी यहां सुर्खियों में रहती हैं। अशिक्षा और अंधविश्वास के कारण आसानी से बहकावे में आ जाने वाले सीधे-सादे लोगों को अभी दो साल पहले ही खूंटी इलाके में एक वर्ग ने पत्थलगड़ी के नाम पर गलत मंशा से बहकाकर एक लोकतंत्रविरोधी विद्रोह छेड़ दिया गया था।

हालांकि इस बार भी इन इलाकों में बंपर वोटिंग कर मतदाताओं ने अपना मिजाज बता दिया। बुनियादी समस्याओं की बात करें तो सिंचाई से लेकर पेयजल तक की किल्लत से ये इलाके जूझ रहे हैं। वहीं स्थानीय और वन उत्पादों पर आधारित उद्योगों के न होने और खदानों के एक-एक कर बंद होते जाने से पनपी बदहाली चुनावों में मुद्दा तो बनती है लेकिन चुनाव खत्म होते ही इसका शोर थम जाता है। बहरागोड़ा में अब तक रेल लाइन नहीं है तो ईचागढ़ और सरायकेला विस्थापन की समस्या से जूझ रहे हैं।

गुमला, सिमडेगा, खूंटी और मंझगांव के इलाके पलायन और मानव तस्करी से त्रस्त हैं। वहीं सब्जी उत्पादक जुगसलाई कोल्ड स्टोरेज के लिए तरस रहा है तो जमशेदपुर और पोटका में स्वास्थ्य सुविधाओं का टोटा है। दम तोड़ रहे उद्योगों को पुनर्जीवन देकर, नए उद्योग लगाकर तथा सिंचाई और पेयजल की योजनाएं को जमीन पर उतारकर और रोजगार के नए द्वार खोलकर इन समस्याओं का समाधान निकाला जा सकता है। अच्छी सरकार चुनकर हम नया झारखंड बना सकते हैं।

Posted By: Sujeet Kumar Suman

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