रांची, ब्रजेश मिश्र। Jharkhand Assembly Election 2019 लोकतंत्र के महापर्व में भागीदार बनने की रेस में सिल्ली समझदार निकली। सुबह से ही कतार में लग गई और शाम होने से पहले दरकिनार हो गई। विकास के एक से दिखने वाले दो फार्मूले में जनता ने अपना रास्ता चुन लिया। सड़कों पर गांव की सरकार नजर आयी। खेतों में जल, जंगल, जमीन की बयार चली। रांची जिले के पांच विधानसभा क्षेत्रों में गुरुवार को हुए चुनाव में सबसे कम मतदाता सिल्ली में थे। क्षेत्र के 199276 मतदाताओं के मतदान के लिए कुल 278 बूथ बनाये गए थे। उत्साह में कहीं कोई कमी नहीं दिखी। कोई खेत छोड़कर वोट देने पहुंचा, कोई गाय-बछड़े से नाता तोड़कर कतारबद्ध दिखा। देर शाम तक जारी आंकड़े 76.97 फीसद तक मतदान की गवाही देते दिखे। वर्ष 2014 में यह आंकड़ा 77.86 फीसद रहा। जाहिर है लोकतंत्र में जनता ने उम्मीदों और उत्साह का दामन थामे रखा।

प्रदेश की राजनीति में किंग मेकर बनने की हसरत लेकर मैदान में उतरे आजसू सुप्रीमो सुदेश कुमार महतो की प्रतिष्ठा यहां एक बार फिर दांव पर है। अपने गांव लगाम में परिवार की लगाम थामे दोपहर करीब 11:30 बजे वह मतदान केंद्र पर पहुंचे। राजकीय प्राथमिक विद्यालय लगाम के बूथ संख्या 123 पर क्रमांक संख्या 344 पर मतदान किया। पत्नी नेहा महतो ने साथ-साथ क्रमांश 346 पर मतदान किया। बेटी सेजल, बेटा शौर्य सिद्धार्थ माता-पिता के कदम से कदम मिलाते बूथ तक गए।

मतदान के बाद सुदेश ने कहा-मैंने झारखंड के विकास के लिए वोट दिया। गांव की सरकार के लिए वोट किया। पोगदा बूथ पर प्रतिद्वंद्वी सीमा देवी ने पति अमित महतो के साथ मतदान किया। कहा कि-हमारा वोट विकास के लिए है। बताया, जल, जंगल, जमीन की रक्षा हमारा नारा है। हम हर हाल में इसे पूरा करेंगे। जीत के दावे दोनों तरफ थे। सुनहरे भविष्य का सपना खुली आंखों में तैरता नजर आ रहा था। कोई भला इसे नजरों से क्यों ओझल होने दे।

लगाम से निकल कर सड़क सिल्ली चौक तक पहुंची। पता चला कि कभी जयपुर की तरह दिखने को बेताब पिंक सिल्ली के रंग फीके पड़े हैं। सत्ता हनक और चमक साथ लाती है। सुदेश के हाथ से निकली सत्ता की लगाम चौराहे के रंग को अपने साथ लेकर चली गई। केले को शुभ का प्रतीक करार देकर दावा किया गया कि गूंज की गूंज फिर सुनाई देगी। आयोजन दिसंबर में न सही, जनवरी में होगा जरूर। अपना गांव होगा, अपनी सरकार होगी।

सिल्ली चौक से सोनाहातू आते-आते माहौल बदल गया। खेल-खलिहान से लेकर घरों तक जल-जंगल, जमीन का नारा बुलंद आवाज में सुनाई पडऩे लगा। कच्चे रास्ते माटी के महत्व को कहीं ज्यादा व्यापक रूप में लोगों तक पहुंचा रहे थे। पानी की प्यास अब भी बरकरार थी। जंगल बरकरार रहें, यह सबका लक्ष्य दिखा। झारखंड की राजनीति का रास्ता जंगल से होकर ही गुजरता है। देखना होगा इतिहास एक बार फिर खुद को दोहराएगा या पिंक चौक की रौनक वापस लाएगा। फैसला 23 दिसंबर को।

Posted By: Alok Shahi

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