जेएनएन, चंडीगढ़। लोकसभा चुनावों के बाद हरियाणा कांग्रेस के प्रधान की विदाई तय है। वर्ष 2014 में डॉ. अशोक तंवर के हरियाणा कांग्रेस की कमान संभालने के बाद चुनावी समर में पार्टी की हार का जो सिलसिला शुरू हुआ था, वह मौजूदा लोकसभा चुनावों में भी नहीं थम पाया। रोहतक लोकसभा सीट को छोड़ दें तो पार्टी कहीं पर भी भाजपा प्रत्याशियों को तगड़ी चुनौती नहीं दे पाई है।

अशोक तंवर द्वारा फरवरी 2014 में हरियाणा कांग्रेस के 19वें प्रधान के रूप में कुर्सी संभालने के तुरंत बाद लोकसभा चुनाव हुए जिनमें पार्टी केवल रोहतक में ही जीत दर्ज कर सकी। हुड्डा परिवार के रसूख के चलते दीपेंद्र सांसद बनने में सफल रहे, जबकि नौ संसदीय क्षेत्रों में कांग्रेस प्रत्याशियों को बुरी तरह हार झेलनी पड़ी। इससे पहले वर्ष 2009 के संसदीय चुनावों में कांग्रेस दस में से नौ सीटों पर विजय पताका फहराने में सफल रही थी।

तंवर के प्रदेश अध्यक्ष रहते कांग्रेस को विधानसभा चुनावों में भी करारी हार झेलनी पड़ी। लगातार दस साल सत्ता में रहने वाली कांग्रेस सिर्फ 17 विधायकों पर सिमट गई। फिर पंचायत चुनाव से लेकर पांच नगर निगमों और फिर जींद उपचुनाव में भी कांग्रेस हार से उबर नहीं पाई और पार्टी प्रत्याशी लगातार चुनाव हारते चले गए। इतना ही नहीं, संगठन के स्तर पर भी कांग्रेस पदाधिकारियों की अभी तक नियुक्तियां नहीं हो पाई हैं।

हरियाणा कांग्रेस में यही वजह है कि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा का खेमा लगातार तंवर को बदलने के लिए लगातार आलाकमान पर दबाव बनाए हुए है। हार की जिम्मेदारी हालांकि हुड्डा की भी उतनी ही है, जितनी तंवर की है, लेकिन इस हार के बाद अब हुड्डा के मुख्यमंत्री पद के दावे पर भी अंगुली उठनी तय है। कांग्रेस के तमाम दिग्गजों के चुनाव हारने का मतलब साफ है कि हाईकमान अब कड़े फैसले लेने को मजबूर होगा।

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Posted By: Kamlesh Bhatt

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