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गुजरात की बाजी: राहुल गांधी के जीएसटी तीर की भाजपा ने यूं निकाली काट

Publish Date:Thu, 02 Nov 2017 11:47 AM (IST) | Updated Date:Thu, 02 Nov 2017 06:48 PM (IST)
गुजरात की बाजी: राहुल गांधी के जीएसटी तीर की भाजपा ने यूं निकाली काटगुजरात की बाजी: राहुल गांधी के जीएसटी तीर की भाजपा ने यूं निकाली काट
कांग्रेस को यकीन है कि जीएसटी, अल्पेश, हार्दिक और जिग्नेश के जरिए वो गुजरात में 22 साल बाद सत्ता में वापसी कर सकेगी। लेकिन कांग्रेस की राह आसान नहीं है।

नई दिल्ली [स्पेशल डेस्क]। गुजरात विधानसभा के 182 सीटों के लिए 9 और 14 दिसंबर को दो चरणों में चुनाव संपन्न होंगे। लेकिन महात्मा गांधी की धरती पर बयानों के जरिए भाजपा और कांग्रेस एक-दूसरे पर निशाना साध रहे हैं। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी लोगों को संबोधित करते हुए कहते हैं कि जीएसटी देश की अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी है, हालांकि दूसरी तरफ वो जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स कहने से भी गुरेज नहीं करते हैं। ये बात अलग है गांधीनगर की जिस सभा में राहुल गांधी ने अमिताभ बच्चन की फिल्म शोले के विलेन गब्बर सिंह से जीएसटी की तुलना की, उसके तुरंत बाद वित्त मंत्री ने राहुल को करारा जवाब दिया। वित्त मंत्री जेटली ने कहा कि 2जी, कोयला घोटाले में लिप्त लोगों को सवाल पूछने का हक नहीं है। जिन लोगों की आदत शुरू से खराब रही हो उनको विधि सम्मत टैक्स में खामियां नजर आ रही हैं। ऐसे में सवाल उठता कि क्या गब्बर सिंह टैक्स के नारे के जरिए भाजपा को हराने में कांग्रेस कामयाब होगी। या यह सिर्फ कांग्रेस के लिए एक स्लोगन ही साबित होगा।

कांग्रेस के रणनीतिकारों को लगता है कि जीएसटी के मुद्दे पर गुजरात के व्यापारियों में मोदी सरकार के प्रति गहरी नाराजगी है। गुजरात का छोटा या बड़ा व्यापारी जीएसटी के क्रियान्वयन को लेकर गुस्से में है। व्यापारियों को लगता है कि केंद्र सरकार या राज्य सरकार उनकी परेशानियों पर ध्यान नहीं दे रही है। ऐसे में कांग्रेस के नेता व्यापारी वर्ग को ये कहकर भरोसा दिला रहे हैं कि सत्ता में आने पर वो लोग इस बात की कोशिश करेंगे कि बेवजह किसी को मुश्किलों को सामना न करना पड़े। 

वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह ने दैनिक जागरण से बातचीत में कहा कि कांग्रेस जीएसटी लागू करने में हो रही दिक्कतों के मुद्दे पर व्यापारियों में असंतोष पैदा करने की कोशिश कर रही है और इसे भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भांप लिया। वह 11 दिन गुजरात में डेरा डाले रहे और रात दो-दो बजे तक व्यापारियों से मिले। सबकी सुनी और फिर अपनी कही। पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी से अलग-अलग मिले। कांग्रेस ने पूरा जोर लगाया कि दीपावली पर व्यापारी-कारखानेदार अपने कर्मचारियों को बोनस न दें, ताकि सरकार पर दबाव बने। व्यापारी तैयार भी हो गए थे, पर अमित शाह से मुलाकात के बाद उन्होंने न केवल बोनस दिया, बल्कि यह भी बताया कि कांग्रेस नहीं चाहती थी कि कर्मचारियों को बोनस मिले। जमीनी स्तर पर इस तरह काम करने वाला कोई नेता कांग्रेस के पास नहीं है। वैसे इस तरह एकदम नीचे पहुंचकर खुद कमान संभाल लेने वाला अध्यक्ष इससे पहले भाजपा के पास भी नहीं था।

इन नेताओं से कांग्रेस को उम्मीद

अल्पेश ठाकोर- ओबीसी समुदाय में पकड़, अब कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं। मूलतः अहमदाबाद के एंडला गांव के रहने वाले अल्पेश समाज सेवा के अलावा खेती और रियल एस्टेट का व्यवसाय भी करते हैं, उनका गांव हार्दिक पटेल के चंदन नगरी से कुछ ही किलोमीटर दूर है। पांच साल पहले अल्पेश तब सुर्खियों में आए थे जब उन्होंने गुजरात क्षत्रिय-ठाकोर सेना का गठन किया था। यह संगठन नशा मुक्ति के लिए गुजरात में काम करता है। आज भी इस संगठन में 6.5 लाख लोग रजिस्टर्ड हैं। हाल ही में अल्पेश ने एकता मंच की स्थापना की थी, जिसके जरिए ओबीसी, एससी, एसटी समुदाय के लोगों को उन्होंने अपने साथ जोड़ा। गौरतलब है कि गुजरात में 22 से 24 प्रतिशत ठाकोर समुदाय के लोग हैं।

हार्दिक पटेल-  पाटीदार समुदाय में पकड़ का दावा, लेकिन कांग्रेस से पाटीदार समुदाय को आरक्षण दिए जाने के मुद्दे पर मतभेद। कांग्रेस ने पाटीदार नेता हार्दिक पटेल की पांच में से चार मांगों पर सहमति जताई है। लेकिन, पाटीदारों को आरक्षण देने के फार्मुले पर सात नवंबर तक का वक्त मांगा है। हार्दिक ने कहा कि सूरत में अब कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की सभा का विरोध नहीं करेंगे। सिर कटा लेंगे पर भाजपा का समर्थन भी नहीं करेंगे।

पाटीदार आरक्षण आंदोलन समिति और कांग्रेस के बीच चर्चा के बाद हार्दिक ने तीन नवंबर को राहुल की सभा का विरोध नहीं करने का एलान किया है। उन्होंने कहा कि भाजपा ने पाटीदार समाज का दमन किया। घरों में घुसकर महिलाओं का अपमान किया तथा युवाओं पर गोलियां चलाईं। इसलिए सिर कटा लेंगे, लेकिन भाजपा का समर्थन नहीं करेंगे। हार्दिक ने कहा कि कांग्रेस से भी उन्हें कोई प्रेम नहीं है। लेकिन, विपक्षी दल होने के नाते वही भाजपा को हराने में सक्षम है। इसीलिए पाटीदार आरक्षण और अन्य मुद्दों पर कांग्रेस से चर्चा कर रहे हैं।

जिग्नेश मेवानी- ऊना में दलित समुदाय के एक शख्स की पिटाई के बाद ये आरोप लगने लगा कि गुजरात की भाजपा सरकार दलित विरोधी है। उस दौरान जिग्नेश मेवानी रूपाणी सरकार की मुखालफत करते नजर आए। कांग्रेस को यकीन है कि अल्पेश ठाकोर, हार्दिक पटेल और जिग्नेश मेवानी की मदद से वो मोदी सरकार को उखाड़ फेकने में कामयाब हो सकेगी। ये बात सच है कि जिग्नेश मेवानी ने हाल के दिनों में दलित समुदाय के बीच पैठ बनाने में कामयाबी हासिल की है। लेकिन दलित समुदाय के बीच उनकी लोकप्रियता वोटों में कितनी तब्दील हो पाएगी। ये देखने वाली बात होगी।

लेकिन अल्पेश, हार्दिक और जिग्नेश के त्रिकोण और कांग्रेस के समर्थन को वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह कुछ और नजर से देखते हैं। 

गुजरात में भी यही हो रहा है। 1985 में उसके नेता माधव सिंह सोलंकी ने जातियों का एक गठजोड़ बनाया था जिसे खाम (क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी, मुस्लिम) कहा गया था। इसने कांग्रेस को ऐतिहासिक चुनावी जीत (149 सीटें) दिलवाई। इसके विरोध में जो आंदोलन हुआ उसमें पाटीदार समाज के सौ से अधिक लोग मारे गए। वह दिन है और आज का दिन, पाटीदारों ने कांग्रेस की ओर मुड़कर नहीं देखा और भाजपा का दामन थाम लिया। इस ऐतिहासिक जीत के बाद कांग्रेस जरात में कभी सत्ता में लौटकर नहीं आई। इस बार खाम तो नहीं, लेकिन कांग्रेस जातियों का एक गठजोड़ बनाने की कोशिश कर रही है। वह इस बात को याद नहीं करना चाहती कि उसकी पिछली कोशिश का दूरगामी असर क्या हुआ था? इस समय तो उसके पास माधव सिंह सोलंकी जैसा कोई कद्दावर नेता भी नहीं है।

हार्दिक को अपने समाज को यह बताना है कि कांग्रेस उनको क्या दे सकती है, जो भाजपा नहीं दे रही। इसीलिए उन्होंने कांग्रेस को सात नवंबर तक का समय दिया है कि वह बताए कि आरक्षण के मामले पर उसका क्या रुख है? कांग्रेस और हार्दिक, दोनों को यह बात पता है कि पाटीदारों को वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था में आरक्षण देना असंभव है और संविधान बदलने की क्षमता कांग्रेस के पास है नहीं। इसलिए पूछने-बताने का यह खेल अपने-अपने खेमे में अपनी साख बचाकर सौदा करने की कोशिश है। यह तय है कि कांग्रेस जैसे ही पिछड़ों के कोटे में से पाटीदारों को आरक्षण देने की बात करेगी, पिछड़े भड़क जाएंगे। अगर वह आरक्षण का वादा नहीं करती तो हार्दिक अपने समर्थकों के बीच क्या मुंह लेकर जाएंगे? तो हार्दिक चाहते हैं कि कांग्रेस उन्हें बचा ले और कांग्रेस की कोशिश है कि हार्दिक उसकी नैया पार लगा दें। ऐसे में दोनों के डूबने की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता है।

जिग्नेश मेवानी अभी बाहर से पानी की थाह ले रहे हैं। तय नहीं कर पा रहे कि उतरें या नहीं? थोड़ा और समय लेने के लिए उन्होंने बयान दे दिया कि कांग्रेस दलितों के मुद्दे पर अपना रुख साफ करे। युद्ध (चुनाव) की घोषणा हो चुकी है। ये तीन ऐसे योद्धा हैं, जिन्होंने कभी कोई युद्ध नहीं लड़ा, पर कांग्रेस इन्हें अपना सेनापति बनाना चाहती है। उसे लगता है कि ये तीनों मिल जाएं तो वह भाजपा के अभेद्य किले को फतह कर सकती है। एक राष्ट्रीय दल की यह दशा विपक्ष की स्थिति बयान करने के लिए काफी है। स्थिति यह है कि कांग्रेस यह तय नहीं करेगी कि हार्दिक पटेल और जिग्नेश मेवानी को वह अपने साथ लेगी या नहीं? दोनों नेता तय करगें कि कांग्रेस उनके साथ के योग्य है या नहीं?

तीनों कांग्रेस के साथ आ जाएं तो भी सवाल है कि वे जिस समाज से आते हैं वह इसे किस रूप में लेगा? अगर मान लें कि ये तीनों कांग्रेस के साथ आ जाते हैं तो भी कांग्रेस का मुकबला मोदी से ही होना है। यह बात तो राहुल गांधी भी स्वीकार कर चुके हैं कि मोदी बहुत अच्छे कम्युनिकेटर हैं। अभी मोदी ने चुनाव अभियान बाकायदा शुरू नहीं किया है। मोदी का करिश्मा पिछले तीन सालों में कम नहीं हुआ है। 

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Web Title:Jagran Special Know how BJP foils Congress GST tactics(Hindi news from Dainik Jagran, newsnational Desk)

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