नई दिल्ली [रितु राणा]। Delhi Assembly Election 2020: राजधानी दिल्ली के युवाओं को कला और संस्कृति में करियर बनाने के लिए उचित मंच और मार्गदर्शन मिल सके। इसके लिए जरूरी है कि स्कूल और कॉलेज स्तर पर इसे गंभीरता के साथ लिया जाए। स्कूलों में इसे लेकर अलग से पाठ्यक्रम भी शुरू किए जाने की जरूरत है। लेकिन, विड़ंबना यह है कि राजधानी के स्कूलोंे और कॉलेजों में कला और संस्कृति को ज्यादा महत्व नहीं दिया जा रहा है। ऐसे में उचित मंच नहीं मिलने की वजह से युवाओं का इसके प्रति रुझान कम हो जाता है। कला और संस्कृति से राजधानी को समृद्ध बनाने और बच्चों में इसके प्रति रुचि बढ़ाने के लिए जरूरी है कि युवाओं समय- समय पर सम्मानित करके प्रोत्साहित किया जाए।

दिल्ली सरकार के सभी स्कूलों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का नियमित रूप से आयोजन किया जाना चाहिए, जिससे कि बच्चों में स्कूल से ही कला व संस्कृति के प्रति रूचि बढ़े। इसके अलावा दिल्ली में जितने भी कॉलेज हैं। सरकार के प्रयास से उन सभी कॉलेजों में भी सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ प्रतियोगिताओं का आयोजन भी अनिवार्य करना चाहिए। जिससे कि बच्चे उत्साहित होकर उनमें भाग लें, प्रतियोगिताओं में अच्छा प्रदर्शन करने वाले बच्चों को लाल किले में आयोजित होने वाले बड़े स्तर के ऐतिहासिक राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में भाग लेने का अवसर दिया जाए। सरकारी स्कूलों में सांस्कृतिक गतिविधियों को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना चाहिए। -प्रवीण शुक्ल, कवि

जितने भी सांस्कृतिक आयोजन किए जाएं वह पूर्वागृह से मुक्त हों, वह किसी तरह के राजनीतिक लाभ के लिए न किए जाएं। राजनीतिक उद्देश्य से किए गए आयोजन सकारात्मक होने के बजाय नकारात्मक हो जाते हैं। सरकार को इंटरनेट पर ज्यादा से ज्यादा कला व संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना चाहिए। नए लेखकों का प्रचार होना चाहिए। जितने भी अध्ययन केंद्र हैं, वहां बड़े पैमाने पर वाद-विवाद का आयोजन हो। सांस्कृतिक कार्यक्रम व प्रतियोगिताएं होनी चाहिए। इसमें ज्यादा से ज्यादा छात्रों की भागीदारी हो यह केवल श्रोता बनकर न रहें। जो बच्चे इन सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेते हैं। उनकी उपलब्धता के अंक परीक्षाओं में जोड़े जाएं। बाल स्वरूप राही, साहित्यकार

सरकार की ओर से कला व संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए जो मंत्रलय व संस्थाएं बनाई गई हैं वह काफी नहीं है। उनकी पहुंच कुछ ही लोगों तक सीमित है। स्कूल व कॉलेज के छात्रों को ऐसे स्थानों पर ले जाना चाहिए, जहां सांस्कृति आयोजन हों। इससे उनके अंदर रूचि पैदा होगी। शिक्षा संस्थानों में प्राथमिक कक्षाओं से ही शिल्प, चित्रकला, गीत, संगीत आदि ललित कलाओं का पाठ्यक्रम होना चाहिए। हमारे देश में विभिन्न राज्यों में अलग-अलग कलाएं हैं। उन सभी का ज्ञान बच्चों को देना चाहिए और उन्हें पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहिए। बड़े-बड़े सिद्ध कलाकारों को बुलाकर बच्चों को कला व संस्कृति के साथ उनके जीवन के अनुभवों से भी अवगत कराया जाना चाहिए । इससे बच्चे प्रेरित हों और विभिन्न कलाओं के संस्थान खोले जाएं और वहां बच्चों के भविष्य को गढ़ा जाए। -कानन झींगन, वरिष्ठ साहित्यकार

आने वाली सरकार को कला संस्कृति भवन बनाना चाहिए। इसमें एक कार्यालय भी बनाया जाए और साहित्यकारों को रहने की जगह भी दी जाए। इसके लिए हमने पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय शीला दीक्षित को पत्र भी दिया था। लेकिन, वह बन नहीं पाया, लेकिन आने वाली सरकार को इस पर काम करना चाहिए। कला सदन या सांस्कृतिक सदन जरूर बनाना चाहिए, जिसमें संगोष्ठी कक्ष व सभागार हो। इससे आने वाली पीढ़ी को एक स्थान मिलेगा। चित्र कला, संगीत कला व साहित्य कलाओं के लिए सांस्कृतिक सदन बनाया जाए। इसमें उर्दू अकादमी, पंजाब अकादमी आदि हैं, ये सभी अधिकारियों के हवाले हैं। इसमें लेखकों व कलाकारों को भागीदारी बढ़ानी चाहिए। कला निधि की स्थापना की जाए, जो छात्रों को अनुसंधान के लिए सहायता प्रदान करें। इसमें लेखकों से भी सहयोग लिया जाना चाहिए।

-मुरली मनोहर प्रसाद, वरिष्ठ साहित्यकार

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Posted By: Prateek Kumar

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