रायपुर। छत्तीसगढ़ में दलबदल करने वाले नेताओं का रिकार्ड कभी अच्छा नहीं रहा। एक-दो मामलों को छोड़ दें तो दलबदल करने वाले नेताओं को ना नए दल में कार्यकर्ताओं का समर्थन हासिल होता है ना जनता सर माथे पर बिठाती है।

हालांकि इसके बावजूद सच्चाई यही है कि चुनाव के समय या बाद में भी नेता अवसरवादी राजनीति के अश्व पर सवार  होकर दलबदल करते रहते हैं। छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण के बाद सबसे बड़ा दलबदल पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के कार्यकाल में हुआ था। जोगी ने विपक्षी भाजपा के 12 विधायकों  को तोड़ लिया था। हालांकि तब जो दलबदल कर सत्ता पक्ष के साथ गए थे उनमें से अधिकांश चुनाव हार गए और अब राजनीतिक हाशिए पर हैं।

दल-बदल का इतिहास पुराना

छत्तीसगढ़ की राजनीति में दल-बदल का पुराना इतिहास है। प्रदेश की राजनीति में कभी सबसे कद्दावर नेता रहे विद्याचरण शुक्ल इसके सबसे बड़े उदाहरण थे। इंदिरा और संजय गांधी के समय देश की राजनीति में अह्म स्थान रखने वाले विद्याचरण शुक्ल 1989 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी का साथ छोड़कर वीपी सिंह के जनता दल में चले गए और केंद्र में मंत्री बने।

इसके बाद उनका राजनीतिक कैरियर बुरी तरह प्रभावित हुआ। वे फिर कांग्रेस में लौटे और मंत्री बने लेकिन तब जो पार्टी की परिस्थितयां थीं उनमें उन्हें अपेक्षित महत्व नहीं मिला। छत्तीसगढ़ बना तो विद्याचरण यहां मुख्यमंत्री बनना चाहते थे, लेकिन उनकी जगह जोगी मुख्यमंत्री बन गए। नाराज होकर वे एनसीपी में चले गए। एनसीपी 2003 के विधानसभा चुनाव में कुछ खास नहीं कर पाई तो वे भाजपा में चले गए। 2004 के लोकसभा चुनाव में महासमुंद से भाजपा की टिकट पर उतरे लेकिन कांग्रेस के अजीत जोगी से हार गए। 2013 में नक्सल घटना में मृत्यु तक वे राजनीति की मुख्यधारा से किनारे ही रहे।

संत भी नहीं बच पाए दल-बदल की दलदल से

दल-बदल की राजनीति के दूसरे बड़े नाम संत कवि पवन दीवान रहे हैं। अपनी मृत्यु के पहले तक वे कई बार दलबदल करते रहे। दीवान 1977 में जनता पार्टी से विधायक बने और मंत्री भी बनाए गए। 1980 में वे जनता पार्टी से अलग हो गए और खुद की छत्तीसगढ़ पार्टी का गठन किया। मध्यप्रदेश में अर्जुन सिंह की सरकार थी तब वे कांग्रेस में चले गए और सांसद बने। 2008 के विधानसभा चुनाव से पहले वे भाजपा में चले गए। 2012 में कांग्रेस में लौटे, फिर भाजपा में चले गए। अंतिम समय में उनका राजनीतिक कैरियर दल-बदल का शिकार होकर रह गया था।

बसपा-एनसीपी के बाद फिर कांग्रेस में पहुंचे नेताम

बस्तर के कद्दावर आदिवासी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम ने 1998 में कांग्रेस से किनारा किया और बसपा में शामिल हो गए। बसपा में कुछ खास नहीं कर पाए तो 2002 में एनसीपी में चले गए। 2007 में कांग्रेस में वापसी की लेकिन पार्टी में अपना पुराना कद दोबारा हासिल नहीं कर पाए। 2012 में वे पीए संगमा की एनपीपी में चले गए। अभी हाल में फिर से कांग्रेस में लौटे हैं। दलबदल से अरविंद नेताम की राजनीति लगभग खत्म हो गई।

पार्टी बदलने के बाद भी जीते कर्मा

दल-बदल करने वाले नेताओं में महेंद्र कर्मा सफल रहे हैं। वे 1980 में दंतेवाड़ा से सीपीआइ के विधायक थे। बाद में कांग्रेस में आए और मंत्री बने। हालांकि कर्मा आखिर में चुनाव हार गए थे। भाजपा के कद्दावर नेता दिलीप सिंह जूदेव के पिता विजयभूषण सिंहदेव जनसंघ में थे। इंदिरा के समय में कांग्रेस में आ गए, लेकिन जनता ने स्वीकार नहीं किया। बाद में उन्होंने सन्यास ले लिया। जूदेव के भतीजे विक्रमादित्य सिंहदेव भी भाजपा से कांग्रेस में गए फिर निर्दलीय हो गए। कोरबा में नवरंगलाल वामपंथी रहे। 1998 में कांग्रेस में शामिल हो गए। उनका यह फैसला गलत साबित हुआ।

रामदयाल उईके हैं ताजा उदाहरण

दलबदल का सबसे ताजा मामला पाली तानाखार के विधायक रामदयाल उइके का है। उइके मरवाही के भाजपा विधायक थे। 2001 में उन्होंने मुख्यमंत्री अजीत जोगी के लिए अपनी सीट छोड़ दी। बाद में वे लगातार कांग्रेस की टिकट पर पाली तानाखार से जीतते रहे। हाल ही में वे वापस भाजपा में चले गए हैं। उनके जाने के बाद सोशल मीडिया में कांग्रेस और भाजपा दोनों के समर्थक उनके खिलाफ दिख रहे हैं।

तरुण चटर्जी की राजनीति खत्म हो गई

रायपुर के कांग्रेस विधायक तरुण चटर्जी पहले भी दल बदलते रहे। वे कांग्रेस में रहे, फिर भाजपा में गए। जोगी के समय एक बार फिर कांग्रेस में आ गए। उनके साथ 12 अन्य विधायक भी कांग्रेस में शामिल हुए थे। तरुण को मंत्री बनाया गया, लेकिन वह उनका आखिरी कार्यकाल था।

उनके साथ गंगूराम बघेल, परेश बागबाहरा, डॉ. सोहन लाल, प्रोफेसर गोपाल राम, विक्रम भगत, मदन सिंह डहरिया आदि भी भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आए थे। जोगी की सरकार जाने के बाद इनमें से किसी की राजनीति दोबारा नहीं उठ पाई।

पिछले चुनाव में हुआ था दलबदलू वर्सेस दल-बदलू

पिछले चुनाव में पाली तानाखार में मुकाबला दल-बदलू वर्सेस दल-बदलू रहा। दरअसल यहां से कांग्रेस ने भाजपा से दल-बदल कर रामदयाल उइके को टिकट दी थी तो भाजपा ने कांग्रेस छोड़कर आए श्यामलाल मरावी को टिकट दी थी। दोनों दल-बदलुओं के बीच मुकाबले में उइके सफल रहे।

Posted By: Prateek Kumar

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