मोदी सरकार - 2.0 के 100 दिन

अरुण उपाध्याय, रायपुर। छत्तीसगढ़ की 90 विधानसभा सीटों पर भाजपा का दांव सफल होगा या कांग्रेस की परिवर्तन की मुहिम रंग लाएगी? 11 दिसंबर को सुबह ईवीएम से निकलने वाला जनादेश इसका जवाब दे ही देगा। नतीजा जो भी आए, सच तो यह है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों को जकांछ- बसपा गठबंधन की मौजूदगी के कारण असहज स्थिति का सामना करना पड़ा है।

सरकार बनाने के दावे तो दोनों राजनीतिक पार्टियां करती रहीं, मगर एक खटका दोनों को लगा रहा। कांग्रेस ईवीएम में गड़बड़ी के अंदेशे से असमंजस में रातभर जागती रही, तो जैसे- जैसे मतगणना की तारीख नजदीक आती गई भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के आंकड़े नीचे उतरते रहे, इस दावे के साथ कि सरकार तो हमारी ही बनेगी।

भाजपा ने जब अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के 65 प्लस लक्ष्य को हाथ में लिया, तब उसे यह अंदाजा नहीं था कि इस बार चुनावी राह बहुत कठिन हो जाएगी। 65 प्लस का राग चुनावी भाषण में केवल औपचारिकता के लिए गाया जाता रहा, हकीकत में भाजपा को उन मुद्दों की तलाश अंत तक रही, जिससे वोट बटोरा जा सके।

इसमें सरकारी सफलताओं की गाथा हर जगह सुनाई गई और वोटर को अच्छे भविष्य का हवाला देकर साधा गया। फिर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने खुद को हर सीट पर उतार दिया। उनके भाषणों में यह बात जरुर आती कि वोटर सीट के प्रत्याशी को नहीं, मुख्यमंत्री को देख कर वोट दें। माना जा सकता है कि भाजपा ने चेहरे के दम पर दांव खेला है, जिसका नतीजा बुधवार दोपहर तक मिल सकता है।

बीते तीन चुनावों में भी भाजपा ने रमन फैक्टर के भरोसे जीत हासिल की है और हर बार वोटों का अंतर घटता गया है। यही कारण है कि इस बार के राजनीतिक विश्लेषक खुद ही उलझ कर रह गए हैं, कोई स्पष्ट राय नहीं दे पा रहे हैं। इसके बावजूद भाजपा को लगता है कि खुद के दम पर नहीं तो गठबंधन के जरिए उनकी सरकार चौथी बार बनेगी।

दूसरी ओर कांग्रेस चुनाव से छह माह पहले से मुद्दे की तलाश में रही। यह मुद्दा बार- बार बदलता रहा, शायद कांग्रेस को हर नए मुद्दे में जनादेश हासिल करने के लिए का रास्ता नजर आता था। भ्रष्टाचार के मसलों को जोर- शोर से उछाला गया, मगर मतदान की अंतिम घड़ी में यह मुद्दा कहीं प्रभावी नजर नहीं आया।

मतदान से एक सप्ताह पहले कांग्रेस ने किसानों की कर्ज माफी को गंभीरता से लिया। तब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने छत्तीसगढ़ के चुनावी भाषणों में किसानों को यह भरोसा दिलाने की कोशिश बार- बार की कि उनकी सरकार बनी तो दस दिनों के भीतर कर्ज माफ हो जाएगा। कांग्रेस को इस मुद्दे में संजीवनी बूटी नजर आयी और मतदान के दिन तक इसे भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ा गया। किसानों के बाद कांग्रेस ने मतदान से 48 घंटे पहले ही मतदाताओं के सामने परिवर्तन का भी मुद्दा प्रभावी तरीके से रखने की कोशिश की। कांग्रेस को भरोसा है कि किसान और परिवर्तन के दो मुद्दों ने सत्ता का वनवास खत्म करने का रास्ता साफ कर दिया है।

इधर जोगीजी धीरे- धीरे...

भाजपा और कांग्रेस के बीच जकांछ- बसपा गठबंधन ने आकर वोटों के समीकरण पर खलबली मचा दिया है। जकांछ संस्थापक अजीत जोगी को भरोसा है कि वोटों के ध्रुवीकरण से उनका गठबंधन सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका में पहुंच जाएगा। दावा तो उनका यह भी है कि सरकार उनके गठबंधन की बन रही है। इस गठबंधन के प्रत्याशियों ने चुनाव पर कितना असर डाला है, यह अब ईवीएम के आंकड़ों से ही पता चलेगा। फिलहाल राजनीतिक विश्लेषक 2003 के चुनाव की तुलना इस चुनाव से कर रहे हैं, जब राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने अपने प्रत्याशी खड़े किए थे।  

Posted By: Hemant Upadhyay

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