रायपुर । विधानसभा चुनाव में मतदान के बाद जैसे ही ईवीएम सील हुआ वैसे नई सरकार व प्रदेश की 90 सीटों के विधायकों की किस्मत 11 दिसंबर तक के लिए कैद हो गई। इसके साथ जो एक बात और महत्वपूर्ण है वह यह कि जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ का भविष्य व जोगी परिवार का राजनीतिक वजूद। कांग्रेस से अलग होकर साढ़े तीन साल पहले अस्तित्व में आई जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ पहली बार तीसरे विकल्प के रूप में जनता की कसौटी पर थी।

नई पार्टी के चुनाव चिन्ह पर अजीत जोगी, उनकी पत्नी रेणु जोगी ने चुनाव लड़ा जबकि उनकी बहू ऋचा जोगी ने जकांछ के साथ गठबंधन कर चुनाव में उतरी पार्टी बसपा से चुनाव लड़ा है। देखना है कि प्रदेश के लोगों ने पुराने कांग्रेसी को कितना वजन दिया है।

कांग्रेस-भाजपा के साथ जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ ने पहली बार ताल ठोंका तो उम्मीद की गई कि कई जगह वे त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति पैदा करने में सफल होंगे। पार्टी के मुखिया तो राज्य के लिए पुराने नहीं हैं पर उनका दल बिल्कुल नया है।

जनता स्वीकार करेगी कि नकार देगी यह तो समय बताएगा पर सबसे खास बात यह है कि पार्टी और पार्टी के मुखिया दोनों के लिए यह चुनाव अस्तित्व का सवाल है। कांग्रेस से अलग होकर छह जून 2016 को अस्तित्व में आए जकांछ के लिए यह पहली परीक्षा है तो कांग्रेस से राजनीति की शुरुआत करने वाले अजीत जोगी के लिए अलग राजनीतिक दल बनाकर अपना वजूद बनाने की लड़ाई है।

देखना रोचक है कि लोकतंत्र के इस यज्ञ में पहली बार यजमान बने जकांछ की पूजा को भगवान रुपी मतदाता स्वीकार करेंगे की नहीं। अजीत जोगी इस बार फिर से मरवाही तो रेणु जोगी कोटा व ऋचा जोगी अलकतरा से चुनाव मैदान में हैं।

राजनीति के जानकार मानते हैं कि यदि 11 दिसंबर को ईवीएम से निकले जनादेश में जोगी व उनकी पार्टी को जनता का आर्शीवाद नहीं मिलता तो पार्टी व जोगी परिवार के राजनीतिक भविष्य पर संकट भी खड़ा हो सकता है। वैसे जोगी को उनकी जीवटता के लिए जाना जाता है। इसलिए भविष्य क्या होगा यह तो नतीजों के बाद ही पता चलेगा।

Posted By: Sandeep Chourey

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