पूर्णिया, जेएनएन। सदर क्षेत्र में इस बार सबसे अधिक 23 उम्मीदवार मैदान में है लेकिन मुख्य मुकाबला एक बार फिर भाजपा एवं कांग्रेस के बीच होने की उम्मीद है। पिछले 20 वर्षों से यहां भाजपा का कब्जा है। यहा 1951 के बाद से अब तक हुए चुनाव व उनचुनाव में छह बार भाजपा एवं पांच बार कांग्रेस ने जीत दर्ज की है। इस बार भाजपा नया रिकार्ड बनाएगी या कांग्रेस वापसी करेगी 10 को काउंङ्क्षटग के बाद फैसला होगा।

पूर्णिया जिले के सभी सात विधानसभा क्षेत्र में अंतिम चरण में 7 नवंबर को मतदान होना है। चुनाव कार्यक्रम का पहला फेज समाप्त हो चुका है तथा प्रत्याशियों के नामांकन व नाम वापसी की तिथि समाप्त हो गई है। नाम वापसी के बाद सभी सात विधानसभा क्षेत्र में 105 दलीय एवं निर्दलीय प्रत्याशी मैदान में ताल ठोकने लगे हैं। लेकिन प्रत्याशियों की सबसे लंबी सूची पूर्णिया सदर विधानसभा क्षेत्र में ही हैं। यहां 23 उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं जिसमें 11 निर्दलीय हैं। हालांकि प्रत्याशियों की संख्या भले ही अधिक है लेकिन मुख्य मुकाबला एक बार फिर भाजपा और कांग्रेस के बीच ही होने की संभावना है। गत विधानसभा चुनाव में भी भाजपा की टक्कर कांग्रेस से ही हुई थी। भाजपा के विधायक विजय खेमका ने 92020 वोट लाए थे इस बार फिर से दोनों मैदान मारने के लिए वोटरों के दर की खाक छान रहे हैं। ऐसे पूर्णिया सदर सीट पर पिछले 20 वर्षों से भाजपा का कब्जा है। समाजवादियों का गढ़ रहे पूर्णिया सदर सीट पर सबसे पहले वर्ष 2000 में हुए विस चुनाव में भाजपा के राजकिशोर केशरी ने जीत का परचम लहराया था। उसके बाद यहां भाजपा ने अपने पैर जमा लिए। राजकिशोर केशरी ने 2005 फरवरी में हुए चुनाव में जीत दर्ज की फिर 2005 अक्टूबर में भी वे एमएलए चुने गये। 2010 में वे चौथी बार विधायक चुने गए लेकिन इसी बीच उनकी हत्या हो गई। उनकी हत्या बाद 2011 में हुए उपचुनाव में उनकी पत्नी किरण केशरी ने भाजपा के टिकट पर जीत हासिल की। 2015 में भाजपा ने अपना उम्मीदवार बदला और विजय खेमका को टिकट दिया जो एक बार फिर यहां कमल खिलाने में कामयाब रहे। इस बार फिर एक बार वे चुनाव मैदान में हैं और अगर उनकी जीत होती है तो सदर क्षेत्र में यह भाजपा की सातवीं जीत होगी।

वहीं कांग्रेस यहां 1951 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज की थी जो 1969 तक लगातार दोहराती रही। कांग्रेस के कमलदेव नारायण ङ्क्षसहा ने 1951 के बाद लगातार 1957, 1962, 1967 तथा 1969 में जीत हासिल की। लेकिन 1972 में हुए चुनाव में कमलदेव बाबू एनसीओ से चुनाव लड़े और जीते। उसके बाद 1977 में जनता पार्टी के टिकट से देवनाथ राय यहां के विधायक चुने गये। उसके बाद से अब तक कांग्रेस यहां जीत का स्वाद नहीं चख पाई है। हालांकि गत चुनाव में भाजपा का मुकाबला कांग्रेस से ही था और इस चुनाव में एक बार फिर महागठबंधन पूरे दम-खम से कांग्रेस प्रत्याशी को जीताने के लिए मतदाताओं को गोलबंद करने में लगे हैं। लेकिन अब 7 को मतदान एवं 12 को काउंङ्क्षटग के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि सेहरा किसके सर बंधेगा।

 

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