महेश कुमार वैद्य, गुवाहाटी। असम के सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी व पूर्व मुख्यमंत्री के नाम पर बने यहां के लोकप्रिय गोपीनाथ बारदोलाई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पहुंचते ही असम की गौरवशाली संस्कृति की झलक मिलनी शुरू हो जाती है। हालांकि एक जगह ठहरकर संपूर्ण असम का मिजाज भांपना संभव नहीं है। यहां जड़ता नहीं जीवंतता है। ठहराव नहीं गति है। अगर आप गुवाहाटी से निकलकर अपर असम की ओर बढ़ें तो 'कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वानी' की कहावत को चरितार्थ होते हुए देखेंगे।

किसी एक संस्कृति का नहीं है असम

दरअसल असम किसी एक संस्कृति का नहीं बल्कि बहुसांस्कृतिक प्रदेश है। यह विविध संस्कृतियों का संगम है। चुनावी मौसम में यहां की महान संस्कृति के संग राजनीति के रंग भी चटख हो रहे हैं। शनिवार को पहले चरण के मतदान के बाद दूसरे चरण में एक व तीसरे चरण में छह अप्रैल को चुनाव होंगे।

बड़ा पैरोकार साबित करने की होड़

असम में राजनीतिक दलों के बीच खुद को असमिया संस्कृति का सबसे बड़ा पैरोकार साबित करने की होड़ है। एक-दूसरे पर असम की संस्कृति को खत्म करने के आरोप लगाए जा रहे हैं, मगर आरोपों से दूर यहां के रीति-रिवाज, रहन-सहन व संस्कृति पहली बार में ही सबको मुरीद बना लेते हैं। असमिया भाषा, असमिया कला, साहित्य और पारंपरिक संगीत यहां की पूंजी है।

समृद्ध है असम की हस्तकला

कला असम की जिंदगी है तो हस्तकला गहना। यहां का बेंत और बांस का शिल्प देश-दुनिया में प्रसिद्ध है। पीतल शिल्प व असम सिल्क की भी अपनी पहचान है, मगर बांस से बना फर्नीचर, बैग, चटाई व लकड़ी और बांस से बने खिलौने मन मोह लेते हैं। बांस का फर्नीचर अब यहां बड़ा व्यापार बन चुका है। बांस को घास की श्रेणी में लाने का मोदी सरकार का फैसला असमिया हस्तकला के लिए राहत भरा रहा है।

बड़ी बकरी जैसी छोटी गायें

यहां मछली चावल सुलभ है, मगर हरियाणा की तरह यहां दूध-दही का खाना दुर्लभ है। प्रति व्यक्ति दूध के मामले में असम देश के टॉप 10 राज्यों में नहीं है। यहां की गायों और बकरियों का आकार हरियाणा की तुलना में बहुत छोटा है। यहां की छोटी-छोटी गायें वैसी हैं, जैसी हरियाणा की कोई बड़ी बकरी।

लिंग आधारित भेदभाव नहीं

यहां के अधिकांश लोग फिट दिखते हैं और आमतौर पर तोंद नहीं दिखती है। औसत कद-काठी पंजाब-हरियाणा की तरह नहीं है। लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं है। यहां लिंगानुपात लगभग बराबर है। राजनीतिक रैलियों व बैठकों में पुरुषों से अधिक महिलाएं नजर आती हैं।

आम हैं तीन इंच की दीवारें

यहां हम अपनी पतली दीवार के कारण सुविख्यात जयपुर के हवामहल की बात नहीं कर रहे हैं। असम में तीन इंच पतली दीवार आम है। बांस के घर से हटकर गरीबी रेखा से थोड़ा सा ऊपर उठने वाले लोग जब पक्का घर या दुकान बनाते हैं तो ईंटों की पूरी बचत की जाती है। यहां पर हरियाणा की तुलना में ईंटें काफी महंगी हैं। इसी कारण ईंट को साढ़े चार इंच की बजाय तीन इंच की साइड से खड़ा किया जाता है।

अनूठा रिवाज: केले से शादी

असम के बोगाइगांव जिले के सोलमारी क्षेत्र में वास्तविक शादी से पहले लड़की की केले के पेड़ से शादी की जाती है। इसे तोलिनी ब्याह कहा जाता है। इस शादी के दौरान लड़की पर सूर्य की रोशनी नहीं पड़ने दी जाती और खाने में केवल कच्चा केला दिया जाता है।