महेश कुमार वैद्य, गुवाहाटी। असम में इन दिनों राजनीति के साथ-साथ सांस्कृतिक धारा भी बह रही है। एक ओर जहां तीसरे व अंतिम चरण के चुनाव के लिए राजनीतिक दलों ने अपनी पूरी ताकत झोंकी हुई है, वहीं दूसरी ओर सक्रिय राजनीति से दूर आम असमिया बिहु की तैयारी में जुटे हैं। बिहु असमिया संस्कृति का ऐसा महापर्व है, जिससे गोसेवा और रामकीर्तन जैसी हिंदुओं की सनातन परंपराएं जुड़ी हैं। बिहू वर्ष में तीन बार मनाया जाने वाला पर्व है।

सिर चढ़कर बोलता है बिहू का उल्लास

बिहु-भोगली अथवा माघ बिहु जहां जनवरी माह में मनाया जाता है, वहीं रोंगाली, बैसाख अथवा बोहग बिहु अप्रैल में। तीसरा बिहु कार्तिक माह में मनाया जाता है। इसे कोंगाली अथवा कति बिहु भी कहते हैं। बिहु का उल्लास सिर चढ़कर बोलता है और यहां सभी जाति व पंथ के लोग इस पर्व को धूमधाम से मनाते हैं। 14 अप्रैल से रोंगाली बिहु का आगाज हो रहा है। छह अप्रैल को तीसरे चरण के मतदान के बाद उम्मीदवारों को जहां हार-जीत की चिंता रहेगी वहीं आम लोग बिहु का जमकर लुत्फ उठाएंगे। मतगणना तक यह उल्लास छाया रहेगा।

बिहू के दौरान चुनेंगे जीवनसाथी

अप्रैल में बिहु के दौरान असम के हजारों युवक-युवतियां अपने जीवनसाथी का भी चुनाव करेंगे। पलटन बाजार निवासी सामाजिक कार्यकर्ता कुकिल ब्रगोहन के अनुसार अप्रैल माह के बिहु पर्व के दौरान हर गांव-गली में सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। यहीं की रेखा बताती हैं कि बिहु के दौरान कई गांवों में रात्रि के समय रामकीर्तन होंगे। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के दौरान युवक-युवतियां एक साथ नृत्य करते हैं। एक-दूसरे की पसंद भांपकर लड़के के माता-पिता लड़की के घर जाकर हाथ मांगते हैं। रिश्ता तय होने के बाद आमतौर पर दहेज रहित शादी होती है। यहां के रीति-रिवाज देखकर यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि असम सनातन संस्कृति का संवाहक है।

प्रथम दिन गायों के नाम

अप्रैल में बिहु के प्रथम दिन का आगाज गोसेवा से होता है। लोग गायों को नदी-तालाब के किनारे ले जाते हैं। उन्हें नहलाते हैं और पौष्टिक चारा खिलाते हैं। इन दिनों बिहु को हर्षोल्लास से मनाने के लिए घरों में साफ-सफाई का काम शुरू हो चुका है। उत्तर भारत के राज्यों में जैसा उत्साह दीवाली का है, असम में उससे कहीं अधिक बिहु का है। यहां की रजनी डेका कहती हैं कि अप्रैल में बिहु खेती से भी जुड़ा है। इस माह धान की रोपाई का शुभारंभ होगा। कुछ सब्जियां भी बोई जाएंगी। नीलम कहती हैं-यह हमारा न्यू ईयर सेलीब्रेशन है। आपके बही-खातों की तरह। असमिया कैलेंडर भी बैसाख से शुरू होता है। मेहमानों को नए कपड़े दान करने की परंपरा भी है।