नई दिल्ली, जेएनएन। ये महज संयोग है कि राहुल गांधी ने जिस दिन पार्टी अध्यक्ष का पद संभाला, उसके ठीक एक साल बाद उनके नेतृत्व में पार्टी ने पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में अभूतपूर्व प्रदर्शन किया। ऐसे में इन चुनावों के परिणाम अगर कांग्रेस के पक्ष में आते हैं तो ये केवल पार्टी के लिए ही नहीं, बल्कि अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी के लिए भी संजीवनी की तरह साबित होंगे।

मालूम हो कि राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता को लेकर हमेशा सवाल खड़े होते रहे हैं। भाजपा समेत तमाम पार्टियां उनकी नेतृत्व क्षमता को लेकर वक्त-वक्त पर सवाल खड़े करती रही है। कांग्रेस के कुछ पुराने व वरिष्ठ नेता भी राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाए जाने पर इशारों-इशारों में असंतोष जता चुके हैं। आलम ये है कि राजनीति में अब तक राहुल के हर कदम फ्लॉप या बिग जोक साबित कर दिया गया। फिर चाहे उनकी कैलाश यात्रा हो या माथे पर चंदन लगाकर मंदिर जाना। जनेऊ वाले उनके बयान और 50 पैसे के आलू वाले बयान को लेकर भी विपक्षी खेमे ने खूब मजाक उड़ाया।

राहुल गांधी आधिकारिक तौर पर 11 दिसंबर 2017 को पार्टी अध्यक्ष चुने गए थे। इस पद पर वह निर्विरोध चुने गए थे। हालांकि राहुल गांधी आधिकारिक घोषणा के काफी पहले से ही अघोषित पार्टी अध्यक्ष के तौर पर काम कर रहे थे। अध्यक्ष चुने जाने के ठीक पहले नवंबर 2017 में हुए चुनावों में कांग्रेस को गुजरात और हिमाचल में करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। भाजपा ने अपने गढ़ गुजरात में सत्ता कायम रखी और हिमाचल भी कांग्रेस के पंजे से छीन लिया। इसे राहुल गांधी की व्यक्तिगत नाकामी के तौर पर देखा गया था।

इससे पहले मार्च 2017 में भी यूपी, गोवा, उत्तराखंड, मणिपुर और पंजाब में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को यूपी, गोवा, उत्तराखंड और मणिपुर में हार का सामना करना पड़ा था। केवल पंजाब में कांग्रेस ने जीत हासिल की थी। कांग्रेस के मणिपुर गंवाने और चार राज्यों में हारने पर भी राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल खड़े किए गए थे।

राहुल के पक्ष में ऐसे बन रहा समीकरण
पांच राज्यों के मौजूदा विधानसभा चुनावों में मिजोरम व तेलंगाना में स्थानीय दलों को बढ़त मिलती दिख रही है। इसके अलावा मध्य प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस के बीट कांटे की टक्कर चल रही है। राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सत्ता में वापस आती प्रतीत हो रही है। इन दोनों राज्यों में अब तक भाजपा की सरकार थी। ऐसे में पार्टी अध्यक्ष बनने के एक साल बाद पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में अगर कांग्रेस रुझान को रिजस्ट में तब्दील कर लेती है तो ये लगातार जनाधार खो रही कांग्रेस के साथ राहुल गांधी के लिए संजीवनी बूटी साबित होगी। चार राज्यों की जीत को कांग्रेस राहुल गांधी के अध्यक्ष पद के एक वर्ष पूरे होने पर उनके उपहार के तौर पर भी प्रस्तुत कर सकती है।

इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं ये नतीजे
पांच राज्यों के इन विधानसभा चुनावों को शुरू से लोकसभा चुनाव 2019 का सेमिफाइनल माना जा रहा है। दरअसल आगामी लोकसभा चुनावों से ठीक पहले ये आखिरी चुनाव हैं। इस वजह से इसे आगामी चुनावों के रुझान के तौर पर देखा जा रहा है। विपक्षी पार्टियां इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की खत्म होती लहर के तौर पर भी लोकसभा चुनावों में पेश करेंगीं। ये नतीजे आगामी चुनावों के लिए कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में भी उत्साह भरने का काम करेंगे।

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