अटारी सीमा पर पकड़ी गई 532 किलो हेरोइन के पीछे अगर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ का हाथ दिख रहा है तो इस पर हैरानी नहीं। आइएसआइ एक अर्से से भारत में पंजाब और जम्मू-कश्मीर के रास्ते हेरोइन और अन्य मादक पदार्थ भेजने में लगी हुई है। इसका मकसद युवा पीढ़ी को नशे की लत लगाकर बर्बादी के रास्ते पर धकेलने के साथ ही इस धंधे से हासिल पैसे के जरिये किस्म-किस्म के आतंकी संगठनों की मदद करना है।

अफगानिस्तान और साथ ही पाकिस्तान के आतंकी संगठनों के वित्तीय स्रोत का एक बड़ा जरिया अफीम, चरस, हेरोइन आदि का धंधा ही है। हमारी विभन्न एजेंसियां इससे अच्छी तरह परिचित हैैं कि इस धंधे की एक कड़ी भारत बना हुआ है, लेकिन इस कड़ी को तोड़ने के वैसे प्रयास नहीं हो रहे हैैं जैसे आवश्यक हैैं। यही कारण है कि जम्मू-कश्मीर और पंजाब में पाकिस्तान से आ रहे मादक पदार्थों की आमद रुकने का नाम नहीं ले रही है।

अटारी सीमा पर बड़ी मात्रा में हेरोइन की बरामदगी के बाद यह कहा जा रहा है कि यह अब तक की सबसे बड़ी खेप है, लेकिन आखिर इसकी क्या गारंटी कि इसके पहले इससे बड़ी खेप नहीं आई होगी? आशंका यही है कि पाकिस्तान से विभिन्न वस्तुओं की आड़ में पहले भी मादक पदार्थों की बड़ी खेप आई होगी। वैसे भी इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि बीते दो महीने में सेब की पेटियों के जरिये दिल्ली लाई गई करीब 60 किलो हेरोइन पकड़ी जा चुकी है।

चिंता की बात केवल यही नहीं कि जम्मू-कश्मीर और पंजाब के जरिये मादक पदार्थों की खेप आ रही है, बल्कि यह भी है कि यही काम पूर्वोत्तर भारत के सीमावर्ती राज्यों के जरिये भी हो रहा है। वहां मादक पदार्थों की तस्करी से अर्जित पैसा अलगाववाद को हवा देने में खपाया जा रहा है तो कश्मीर और पंजाब में आतंकवाद की आग भड़काने में। सीमावर्ती इलाकों से नशे की आपूर्ति जारी रहना नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के साथ अन्य एजेंसियों की नाकामी को ही बयान करता है।

देश को बर्बादी के रास्ते पर ले जाने वाले नशे की आमद रुकनी ही चाहिए। आज शायद ही देश का कोई हिस्सा हो जहां नशे की आमद और उसका इस्तेमाल बढ़ न रहा हो। इसका एक कारण भारतीय समाज में पहले से तंबाकू, शराब आदि का चलन है। इस तरह के नशे के आदी लोग कहीं आसानी से अफीम, चरस, हेरोइन, कोकीन आदि घातक नशे की गिरफ्त में फंस जाते हैैं। ऐसे लोग मुश्किल से ही इस गिरफ्त से निकल पाते हैैं।

स्पष्ट है कि जितनी जरूरत नशे की तस्करी पर सख्ती से रोक लगाने की है उतनी ही इसकी भी कि देश के लोग और खासकर युवा पीढ़ी नशे की लत से बची रहे। इसके लिए समाज को भी सक्रियता और जागरूकता दिखानी होगी। यह कोई शुभ संकेत नहीं कि रेव पार्टियों के आयोजन की खबरें अब रह-रहकर आने लगी हैैं। ऐसी पार्टियों का आयोजन एक तरह की पतनशीलता का ही परिचायक है। जिस देश का युवा वर्ग नशे की चपेट में आ जाए वह अपने उज्ज्वल भविष्य के प्रति सुनिश्चित नहीं होे सकता।

Posted By: Bhupendra Singh

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