शराब घरों को बर्बाद कर रही है। पुरुषों में इसकी बुरी लत के कारण महिलाओं को दूसरों के घरों में जाकर मेहनत-मजदूरी करनी पड़ती है, जिससे परिवार चलता है। ग्रामीण इलाकों में आधी आबादी इससे ज्यादा परेशान है, पति सुबह कमाने की बात कहकर घर से निकलता है, परंतु पहुंच जाता है अवैध शराब की भट्ठी पर, गांव के दबंग ये भट्ठियां चलाते हैं। ये गरीब-गुरबे से दिनभर मजदूरी कराते हैं और पैसा न देकर उसे शराब में डुबो देते हैं। नशे में घर पहुंचने पर पत्नी पैसा मांगती है तो उसे पिटाई नसीब होती है। वह चाहकर भी अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेज पाती, उसके बच्चे या तो आवारागर्दी करते हैं और बड़े होने पर जरायम की दुनिया में कदम रख लेते हैं। कर-बल और छल से चुनाव जीतने के बढ़ते ट्रेंड का दुष्परिणाम यह हुआ है कि अब शराब वोटों का जुगाड़ करने में बड़ी भूमिका अदा करने लगी है। गांव-गिरांव में मतदान के महीनों पहले से दावत शुरू हो जाती है। इनमें मुफ्त की शराब पिलाकर सहानुभूति बटोरने की कोशिशें की जाती हैं। शराब और कबाब से शुरू होने वाला दौर वोटिंग की तारीख नजदीक आते ही नोटों के खेल मेंं तब्दील हो जाता है। बिहार में पहली बार हुआ है जब चुनाव आयोग की पैनी नजर धनबल और बाहुबल के अलावा शराबबल पर भी पड़ी है, हालांकि इसे रोकने के लिए कड़े कदम आचार संहिता के तुरंत बाद ही उठाए जाने चाहिए थे। आयोग ने वोट के लिए शराब की नदियां बहाने की मिली जानकारियों के बाद जो कदम उठाया है उससे सिर्फ शहरी विधानसभा क्षेत्र में ही थोड़ा-बहुत अंकुश की गुंजाइश बनेगी, क्योंकि ग्रामीण इलाकों में हो रही चुनावी दावत में कच्ची शराब का चलन ज्यादा है, यहां कच्ची शराब अवैध भट्ठियों के अलावा गली-टोले में घर-घर बनाई जाती है। वैसे एक अच्छी बात ये है कि इधर कुछ महीनों से ग्रामीण-शहरी इलाकों में शराब से हो रहे घर की बर्बादी को रोकने के लिए महिलाएं संगठित होकर आंदोलन करने लगी हैं। कुछ दिनों पहले राजधानी पटना में एक कार्यक्रम में शराब के खिलाफ आवाज बुलंद करते हुए महिलाओं ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से इसपर प्रतिबंध लगाने का आग्रह किया था, उस वक्त सीएम ने उन्हें यह आश्वासन दिया था कि अगर वे पुन: सत्ता में आए तो इसपर प्रतिबंध लगाएंगे।

बिहार चुनाव में शराब का दरिया बहाकर वोटरों को प्रभावित करने से रोकने को चुनाव आयोग की ओर से उठाए गए कदमों में मुख्य सचिव व जिला निर्वाचन पदाधिकारियों को यह निर्देश दिए गए हैं कि वे शराब की फैक्ट्री से लेकर खुदरा दुकानदार तक पर पैनी नजर रखने के प्रबंध करें। यह हिसाब-किताब रखा जाए कि फैक्ट्री या गोदाम से कितनी शराब आ रही है और कितनी खपत हो रही है। यह भी कहा गया है कि चुनाव के समाप्त होने तक इसके कारोबार पर पैनी नजर रखी जाए। विदेशी शराब, बीयर और देशी शराब के केन्द्रीय भंडारागार पर भी निगरानी के निर्देश दिए गए हैं। थोक दुकानदारों की स्टॉक सीमा में वृद्धि नहीं होनी चाहिए, यह भी निर्देश दिए गए हैं। बड़े स्टॉक प्वाइंट पर दिन-रात वीडियो रिकार्डिंग कर नजर रखने के साथ उत्पाद अधिकारी से भी रोज की आमद-खपत की निगरानी करने को कहा गया है। शराब की दुकान के खुलने और बंद होने के तय समय का सख्ती से पालन करने और दुरुपयोग रोकने को छापेमारी के आदेश हैं। सवाल यह उठता है कि जब शराब निष्पक्ष चुनाव कराने में इतनी बड़ी विलेन बनती है तो आचार संहिता लागू होने के साथ ही चुनाव प्रक्रिया पूरी होने तक इसकी बिक्री पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगा दिया जाता?

[स्थानीय संपादकीय: बिहार]

Posted By: Bhupendra Singh