भारतीय प्रधानमंत्री की ओर से पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान को चिट्ठी भेजकर बधाई देने और उसमें दोनों देशों के बीच बेहतर संबंधों की अपेक्षा व्यक्त करने में ऐसा कुछ भी नहीं जिसे लेकर सवाल खड़े किए जाएं। समझना कठिन है कि कुछ लोग इस चिट्ठी का मजमून जाने-समझे बिना आलोचना करने के लिए आगे क्यों आ गए? इतना उतावलापन ठीक नहीं। विदेश नीति के मामले में तो यह और भी आवश्यक है कि सारी बात जान-समझकर ही प्रतिक्रिया व्यक्त की जाए।

यह अच्छा हुआ कि पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारतीय प्रधानमंत्री ने उनके प्रधानमंत्री को लिखी गई चिट्ठी में बातचीत की कोई पेशकश नहीं की है, लेकिन यह भी उसे ही बताना चाहिए कि जब ऐसी कोई पेशकश की ही नहीं गई थी तो फिर विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने अपने कथन से यह आभास क्यों कराया कि भारत नए सिरे से वार्ता के लिए तैयार है? इससे उत्साहित नहीं हुआ जा सकता कि पाकिस्तान की ओर से यह भी कहा गया कि विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी यह कहना चाह रहे थे कि भारतीय प्रधानमंत्री ने रचनात्मक शुरुआत की बात कही है और दोनों देशों के बीच सारी समस्याओं का समाधान सतत बातचीत ही है।

इसमें दोराय नहीं कि दोनों देशों के बीच सार्थक संबंध तभी संभव हैं जब उनमें किसी न किसी स्तर पर बातचीत होगी, लेकिन मौजूदा हालात में भारत की ओर से पाकिस्तान के समक्ष यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि बातचीत के लिए उपयुक्त आधार तैयार करने का काम उसका ही है और यह उसे करना ही होगा।

नि:संदेह इमरान खान परंपरागत नेता नहीं हैं और उन्होंने चुनावी जीत के बाद अपने भाषण में कश्मीर समस्या का जिक्र किए बिना भारत से संबंध सुधारने की इच्छा व्यक्त की थी, लेकिन केवल इतने से बात बनने वाली नहीं है। उन्हें भारत से बातचीत के पहले यह भरोसा दिलाना होगा कि पाकिस्तान वार्ता के साथ ही आतंकवाद जारी रखने की अपनी नीति से बाज आ चुका है। पाकिस्तान की कमान संभालने वाले क्रिकेटर से नेता बने इमरान भारत संबंधी नीति में कुछ फेरबदल करने की क्षमता रखते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या पाकिस्तानी सेना उन्हें ऐसा करने की इजाजत देगी, जो भारत के लिए खतरा बने आतंकी संगठनों को अपना सहयोगी मानती है?

इसका कोई मतलब नहीं कि पाकिस्तान से केवल इसलिए नए सिरे से बातचीत की जाए क्योंकि वहां सत्ता परिवर्तन हो चुका है। यह काम वहां कई बार हो चुका है और अभी तक का अनुभव यही बताता है कि भारत को धोखा देने की उसकी उस नीति में कहीं कोई बदलाव नहीं हुआ है जिसके सूत्र पाकिस्तानी सेना और उसकी बदनाम खुफिया एजेंसी आइएसआइ के हाथों में हैं।

भारत यह नहीं भूल सकता और न ही उसे भूलना चाहिए कि जब-जब पाकिस्तान के कपट भरे इरादों की अनदेखी करके उसकी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया गया उसने पीठ पर वार ही किया है। पाकिस्तान से बातचीत में हर्ज नहीं, लेकिन आखिर इसकी गारंटी कौन लेगा कि पाकिस्तानी सेना अपने आतंकियों से गुरदासपुर, पठानकोट, उड़ी, नगरोटा जैसे आतंकी हमले नहीं कराएगी?

Posted By: Bhupendra Singh