गुटों में बंटे झारखंड के 80 हजार पारा शिक्षकों में से आंदोलनरत एक धड़ा मुख्यमंत्री के आश्वासन से संतुष्ट होने के बावजूद जिस प्रकार बाल-बच्चों के साथ रांची में जमा हुआ है, वह शासन के प्रति एक साथ विश्वास और अविश्वास की पराकाष्ठा है। इस गुट की नाक चढऩे का बहाना भले ही मानव संसाधन विकास मंत्री और सचिव का बयान बना हो, लेकिन उसका कार्य-व्यवहार सीधे-सीधे दबाव की नीति है। आज भी भले ही आंदोलनों में गांधीवादी तरीके की बातें की जाती हैं, लेकिन काम वह दबाव ही आता है, जिससे प्रबंधन खुद को असहज महसूस करता है। अन्यथा दस-बीस लोग मांग पत्र दें अथवा धरना देते रहें, कोई फर्क नहीं पड़ता। एक तो विधानसभा का सत्र चल रहा है, दूसरे आंदोलनकारियों का संख्या बल और तीसरे इससे प्रभावित होने वाले बच्चों की तादाद लाखों में होने के कारण मनोबल ऊंचा है। मुख्यमंत्री यानी सरकार ने चार दिन में ही समस्या समाधान का आश्वासन दिया तो इन्हें यह भी लगा कि बीच में एक दिन रविवार का सार्वजनिक अवकाश, बाकी तीन दिन जैसे-तैसे गुजार कर भरी झोली ही लेकर घर लौटें।

न केवल पारा शिक्षक, अपितु इस प्रकार के अनेक पदों पर बहाल होने वाले लोगों की मानसिकता ही अलग होती है। पहले जैसे-तैसे सरकारी सेवा में घुस जाओ। फिर मानदेय बढ़ाने की मांग के रास्ते नियमित नौकरी तक की मंजिल हासिल कर लो। वोट की राजनीति में कल्याणकारी सरकारें अंतत: झुक ही जाती हैं। ऐसे हर मौके पर प्रतिपक्ष निश्चित तौर पर इन समूहों के साथ हो जाता है। ऐसे लोगों से जुड़े परिवार और हित-मित्रों की संख्या को भी राजनेता अपने वोट में जोडऩे का समीकरण बैठाते हुए खजाने का मुंह खोल देते हैं। सार्वजनिक धन के प्रति अवाम ही नहीं, सरकारें भी बहुत मोह-माया नहीं रखतीं। इसकी बदौलत यदि वोट बनता हो, राजनीति चमकती हो तो इससे सुखद और क्या हो सकता है? मुख्यमंत्री से आश्वस्त होने के बावजूद अपनी जिद पूरी होने तक हजारों लोगों का एक जगह पर जमे रहना संघ की शक्ति का ही अहसास कराता है। प्रजातंत्र में संख्याबल ही मायने रखता है। यही कारण है कि कान्वेंट स्कूलों से ज्यादा खर्च करने के बावजूद प्राइमरी से लेकर उच्चतर कक्षाओं तक के शिक्षकों से किसी भी सरकार को यह पूछने का साहस नहीं हुआ कि आपके पढ़ाए छात्र-छात्राएं उनकी बराबरी क्यों नहीं कर पाते? समान काम के लिए समान सुविधाएं सैद्धांतिक तौर पर सही सिद्धांत है, लेकिन सेवा शर्तों और गुणवत्ता का भी आकलन तो होना ही चाहिए।

[स्थानीय संपादकीय: झारखंड]

Posted By: Bhupendra Singh