झरनों, पहाड़ों, जंगलों, आध्यात्मिक स्थलों और खनिजों से भरपूर झारखंड में पंद्रह वर्षों बाद पर्यटन नीति को मंजूरी देते हुए सार्वजनिक किया जाना एक महत्वपूर्ण कदम है। इस राज्य के प्रकृति की गोद में बसे होने के बावजूद अब तक पर्यटन क्षेत्र में बहुत कुछ न किया जा सकना दुर्भाग्यजनक रहा। प्राय: हर अच्छे काम इस राज्य में देर से किए जाने की परंपरा सी बन गई है। राजनेताओं में दूरदृष्टि और इच्छाशक्ति की कमी तथा अधिकारियों में उत्साह नहीं होने के कारण ऐसा होता रहा। यहां तक कि केंद्र सरकार द्वारा घोषित योजनाओं का भी लाभ उठाने में यहां पिछड़ जाते रहने का इतिहास है। अपेक्षाकृत कम प्राकृतिक सौंदर्य और संसाधनों वाले राज्य भी पर्यटन क्षेत्र में विकास कर इससे उद्योग के समान धनार्जन तो करते ही रहे हैं, वे इसी बहाने देश-विदेश में अपनी ब्रांडिंग भी कर लेते हैं। इसके विपरीत इस राज्य की ब्रांडिंग पिछड़ेपन, लूट-खसोट, असुरक्षा और तबादला उद्योग वाले प्रदेश के रूप में ही होती रही। यहां देवघर के द्वादश ज्योतिर्लिंग सहित जैन तीर्थस्थली पाश्र्वनाथ जैसे दो विश्वस्तरीय और ऐतिहासिक धार्मिक पर्यटन क्षेत्र सदियों से बने होने के बावजूद इनका भरपूर लाभ नहीं उठाया जा सका। पश्चिम बंगाल की सीमा पर दुमका जिले में 108 ऐतिहासिक मंदिरों वाले गांव मलूटी से लेकर दूसरे कोने में उत्तरप्रदेश से सटे नगर उंटारी में कृष्ण-राधा की विशाल सोने वाली मूर्तियों का वंशीधर मंदिर का आकर्षण पैदा न किया जा सकना अफसोसजनक रहा।

उत्तराखंड में मसूरी के निकट का कैम्प्टी फॉल सैलानियों के लिए सहज आकर्षण के केंद्र के बतौर विकसित किया गया है, जबकि वैसे अनेक फॉल इस राज्य में हैं किंतु उनकी पहचान उग्रवादियों की मांद के रूप में बन जाना किस कदर दुर्भाग्यपूर्ण है, इसका अंदाजा झारखंड की सरकारों को रहा ही नहीं। बधाई का पात्र झारखंड हाईकोर्ट है, जिसने ऐसे पर्यटक स्थलों को विकसित करने का राज्य सरकार पर दबाव बनाया। देश का लगभग 40 फीसद खनिज भंडार रखने वाला यह राज्य पर्यटकों के लिए आकर्षण नहीं बन पाया तो निश्चय ही इसके लिए अपनी सरकारें ही दोषी रही हैं। निश्चय ही उद्योग के रूप में पर्यटन तभी विकसित हो सकता है, जब अमन-चैन कायम हो। इस तत्व का झारखंड में सर्वथा अभाव है। इसको चुनौती के रूप में लेते हुए उग्रवादियों और अपराधी गिरोहों को नेस्तनाबूद करने की सरकार की घोषणा अमल में आए तो निश्चय ही पर्यटन क्षेत्र से झारखंड की पहचान कायम होगी।

[स्थानीय संपादकीय: झारखंड]

Posted By: Bhupendra Singh