कर्ज में डूबी सरकारी एयरलाइन कंपनी एयर इंडिया का फिर से टाटा के पास जाना एक उल्लेखनीय आर्थिक घटनाक्रम है। इससे सरकार की यह प्रतिबद्धता नए सिरे से प्रकट हो रही है कि वह घाटे में चल रहे अपने उपक्रमों के निजीकरण के लिए प्रतिबद्ध है। एयर इंडिया की बिक्री इसलिए आवश्यक हो गई थी, क्योंकि उसके घाटे से उबरने के कहीं कोई आसार नहीं थे। एक लंबे समय से सरकार उस पर धन व्यय कर रही थी, लेकिन वह घाटे से बाहर आने का नाम नहीं ले रही थी। यह अच्छा हुआ कि एयर इंडिया वापस टाटा के पास गई। इस एयरलाइन को टाटा ने ही शुरू किया था, लेकिन बाद में सरकार ने उसका राष्ट्रीयकरण कर दिया। यह एक गलत कदम था। इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि उस समय यह एयरलाइन दुनिया की प्रमुख उड्डयन कंपनियों में शामिल थी। दुर्भाग्य से उस समय के हमारे शासक इस सोच से ग्रस्त थे कि सब कुछ और यहां तक कि उद्योग-धंधे भी सरकार को चलाने चाहिए। इस सोच ने कुल मिलाकर निजी क्षेत्र को हतोत्साहित ही किया। रही-सही कसर कोटा-परमिट राज ने पूरी कर दी।

नि:संदेह आजादी के तत्काल बाद जब भारत का निजी क्षेत्र पर्याप्त सक्षम नहीं था, तब तो इसका थोड़ा-बहुत औचित्य था कि सरकार बड़े उद्योगों को खुद चलाए, लेकिन धीरे-धीरे इस जिम्मेदारी से पीछा छुड़ाने की जो आवश्यकता थी, उसकी पूर्ति नहीं की गई। इससे भी खराब बात यह हुई कि सरकार छोटे-छोटे उद्योग और यहां तक कि होटल भी चलाने लगी। टाटा समूह के लिए यह जहां एक सुखद क्षण है कि एयर इंडिया फिर से उसके हाथों में आ गई वहीं उसे घाटे से उबारना एक चुनौती भी है। उम्मीद है कि वह इस चुनौती का सामना करने में सक्षम साबित होगी। यह उम्मीद इसलिए की जा रही है, क्योंकि एक तो टाटा को अपनी पुरानी कंपनी वापस मिल रही है और दूसरे उसके पास एयरलाइन कंपनियों के संचालन का अच्छा-खासा अनुभव है। विस्तारा और एयर एशिया में उसकी हिस्सेदारी है। एक तरह से टाटा के पास अब तीन एयरलाइन कंपनियां हो गई हैं। यह भविष्य बताएगा कि टाटा प्रबंधन कैसे एयर इंडिया को फिर से पटरी पर लाता है, लेकिन यह संतोषजनक है कि सरकार ने इस कंपनी के कर्मचारियों के हितों का ध्यान रखने का आश्वासन दिया है। उसे इस आश्वासन पर इसलिए खरा उतरना होगा, क्योंकि इससे ही वह घाटे वाले अपने अन्य उपक्रमों का निजीकरण आसानी से कर पाएगी। इस मामले में यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी सरकारी उपक्रम के घाटे में डूबने के पहले ही उसका निजीकरण करना बेहतर होता है।

Edited By: Manish Pandey