प्रधानमंत्री ने मन की बात कार्यक्रम में एक साथ चुनाव कराने को लेकर हो रही चर्चा को लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत बताकर एक तरह से इस मसले को नए सिरे से उभारने का ही काम किया है। यह इसलिए उल्लेखनीय है, क्योंकि चंद दिन पहले ही मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने कहा था कि कानूनी ढांचे का निर्माण किए बिना एक साथ चुनाव कराना संभव नहीं है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि फिलहाल एक साथ चुनाव की कोई संभावना नहीं।

प्रधानमंत्री और मुख्य चुनाव आयुक्त के विचारों को विरोधाभासी नहीं समझा जाना चाहिए। जहां प्रधानमंत्री एक साथ चुनाव पर बहस को जारी रखने की पैरवी कर रहे हैं वहीं मुख्य चुनाव आयुक्त इस बहस को किसी अंजाम तक पहुंचाने की जरूरत रेखांकित कर रहे हैं। इस जरूरत की पूर्ति इस मुद्दे पर स्वस्थ बहस से ही संभव है। विडंबना यह है कि स्वस्थ बहस के नाम पर आरोप-प्रत्यारोप की संकीर्ण राजनीति अधिक हो रही है। जो राजनीतिक दल एक साथ चुनाव के विचार से सहमत नहीं वे कोई ठोस तर्क देने के बजाय यह कहने में लगे हुए हैं कि सरकार लोकतंत्र को कमजोर करना चाहती है।

कुछ नेता साथ-साथ चुनाव को क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के लिए खतरा बता रहे हैं तो कुछ केवल विरोध के लिए विरोध जताने में लगे हुए हैं। ऐसे लोग यह जानने-समझने के लिए भी तैयार नहीं कि स्वतंत्रता के बाद कई वर्षों तक लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ ही होते रहे। यदि पहले एक साथ चुनाव कराना संभव था तो अब क्यों नहीं है? इस सवाल का कोई ठोस जवाब अभी तक सामने नहीं आ सका है।

अब जब यह करीब-करीब स्पष्ट है कि आगामी लोकसभा चुनावों के साथ विधानसभाओं के चुनाव होने की संभावना बहुत क्षीण है तब बेहतर यह होगा कि अगले से अगले आम चुनावों के साथ विधानसभाओं के चुनाव कराने पर स्वस्थ दृष्टिकोण से बहस पर ध्यान केंद्रित किया जाए। ऐसा करते समय राजनीतिक दलों को अपने चुनावी हितों के साथ-साथ राष्ट्रीय हितों पर भी ध्यान देना होगा। वे इसकी अनदेखी नहीं कर सकते कि बार-बार चुनाव होते रहने से केवल राष्ट्रीय संसाधनों पर ही बोझ नहीं पड़ता, बल्कि राजनीतिक विमर्श एक संकुचित दायरे तक ही सीमित रहता है। इसके चलते राजनीतिक दल राष्ट्रीय महत्व के मसलों पर नीर-क्षीर ढंग से विचार करने के बजाय चुनावी लाभ लेने की होड़ में फंसे रहते हैं। ऐसा करके एक तरह से वे अपना और साथ ही देश का भी समय जाया करते हैं।

यदि राजनीतिक दल हर दो-चार माह में चुनाव की चिंता करते रहेंगे तो फिर वे राष्ट्रीय हितों की सुध कब लेंगे? प्रधानमंत्री ने लोकतंत्र के लिए उत्तम परंपराएं विकसित करने में अटल बिहारी वाजपेयी के योगदान का स्मरण करते हुए यह भी कहा कि वह खुले मन से चर्चाओं को आगे बढ़ाने के लिए प्रयासरत रहते थे। बेहतर होगा कि प्रधानमंत्री यह देखें कि एक साथ चुनाव के मसले पर खुले मन से चर्चा के लिए क्या कुछ करने की जरूरत है? इसी के साथ उन्हें अन्य राजनीतिक सुधारों को भी आगे बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि हमारी तमाम लोकतांत्रिक परंपराएं निष्प्राण-निरर्थक सी होकर रह गई हैं।

Posted By: Bhupendra Singh