राज्य सरकार किसानों की आमदनी दोगुना करने के रोडमैप पर चल रही है, इसके विपरीत निचले स्तर का तंत्र किसानों को उनके वाजिब हक से भी वंचित करने पर आमादा है। प्रदेश भर की मंडियों में लगे धान के ढेर प्रमाण हैं कि क्रय केंद्रों पर अपेक्षानुसार धान खरीद नहीं हो रही। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने धान किसानों की बेहतरी के लिए खासा प्रयास किया। उनकी पहल पर केंद्र सरकार ने धान में नमी की अनुमन्य दर 17 से बढ़ाकर 19 फीसद की, इसके बावजूद किसानों को क्रय केंद्रों से टरकाया जा रहा है।

क्रय केंद्रों पर तैनात कर्मचारियों के पास इतने बहाने रहते हैं कि उनसे पार पाना किसानों के लिए मुमकिन नहीं। इन हालात में किसान अपनी उपज बेचने के लिए मंडियों की राह पकड़ रहे हैं जहां सरकारी क्रय मूल्य से 400-500 रुपये प्रति क्विंटल कम दर पर उनकी उपज खरीदी जा रही है।1किसानों की सबसे बड़ी मजबूरी यह है कि उन्हें तुरंत रबी फसल की बोवाई करनी है जिसके इनपुट की व्यवस्था के लिए उन्हें धन चाहिए। सरकार ने इस बात को समझते हुए किसानों की सुविधानुसार शीघ्र भुगतान के नियम बना रखे हैं। बहरहाल, क्रय केंद्र कर्मचारियों की मनमानी के आगे सब नियम-कायदे बेकार साबित हो रहे हैं।

विडंबना है कि सरकार का कोई मंत्री या अधिकारी किसी क्रय केंद्र पर यह देखने नहीं गया कि वहां कैसे हालात हैं। इस बात की पड़ताल कराई जानी चाहिए कि सरकारी क्रय केंद्र छोड़कर किसान मंडियों में धान क्यों बेच रहे हैं। अभी भी समय है। सरकार के मंत्री और अफसर कमर कसें कि किसानों को धान की उपज का सरकारी मूल्य दिलाया जाएगा। जो एजेंसियां धान खरीद कर रही हैं, उन्हें कड़े निर्देश दिए जाएं कि किसी भी वजह से किसानों का उत्पीड़न करना बंद करें। किसानों को हतोत्साहित करने के लिए कई-कई दिन क्रय केंद्रों पर खड़ा रखा जाता है। उनसे कहा जाता है कि वे अपनी उपज सुखाकर लाएं। क्रय केंद्रों पर किसानों की सुविधा के कोई प्रबंध नहीं हैं। इन केंद्रों पर बिचौलियों का वर्चस्व है। वे किसानों को न सिर्फ हतोत्साहित करते हैं बल्कि उनकी उपज बिकवाने के लिए तरह-तरह की शर्ते भी रखते हैं। 

[बिहार संपादकीय]

Posted By: Ravindra Pratap Sing

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